एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद प्रश्न उत्तर

कक्षा 9 हिंदी (गंगा) अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद के प्रश्न उत्तर, सारांश, भावार्थ, कवि परिचय, कठिन शब्दार्थ तथा व्याकरण अभ्यास यहाँ सरल भाषा में प्रस्तुत किए गए हैं। यह पाठ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है। इसमें शिव-धनुष भंग होने के बाद परशुराम, राम और लक्ष्मण के बीच होने वाले रोचक संवाद का वर्णन है। पाठ में परशुराम का क्रोध, राम की विनम्रता और लक्ष्मण की निर्भीकता प्रभावशाली रूप में दिखाई देती है। यह अध्याय विद्यार्थियों को अवधी भाषा, दोहा-चौपाई शैली, चरित्र-चित्रण और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की समझ विकसित करने में सहायता करता है।

CBSE क्लास 9 हिंदी गंगा चैप्टर 9 के सोलूशन्स बोलो!

मेरे उत्तर मेरे तर्क – (पेज 156 का प्रश्न और समाधान)

1. “पितु समेत किह किह निज नामा लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मन: स्थिति को दर्शाती है?

(क) आदर और सम्मान

(ख) भक्ति और श्रद्धा

(ग) भय और शिष्टाचार

(घ) प्रेम और सहिष्णुता

सही विकल्प: (ग) भय और शिष्टाचार

उत्तर: परशुराम जी के भयानक और क्रोधी रूप को देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा अत्यधिक डर गए थे। वे भय के कारण शिष्टाचार निभाते हुए अपने पिता सहित अपना नाम बताकर दंडवत प्रणाम कर रहे थे।

व्याख्या: जब मुनि परशुराम हाथ में कुल्हाड़ा लिए अत्यंत क्रोध में जनक की सभा में आए, तो उनका भयानक वेश देखकर वहाँ उपस्थित राजाओं का साहस जवाब दे गया। वे डर के मारे काँप उठे। अपनी जान बचाने और मुनि के कोप से बचने के लिए वे डर (भय) के मारे एक-एक करके अपने पिता का और अपना नाम बोलकर उन्हें साष्टांग प्रणाम करने लगे। यह व्यवहार आदर से ज्यादा उनके भीतर व्याप्त गहरे डर और विवशता में निभाए जा रहे शिष्टाचार को प्रकट करता है।

2. “जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?

(क) संवेदनशीलता

(ख) शिष्टता

(ग) सहनशीलता

(घ) उदासीनता

सही विकल्प: (ख) शिष्टता

उत्तर: राजा जनक एक अत्यंत संस्कारी और मर्यादित राजा थे। परशुराम जी को क्रोधित देखकर वे पुनः आगे आए, उन्हें सिर झुकाया और अपनी पुत्री सीता को बुलाकर प्रणाम करवाकर अपनी उच्च शिष्टता का परिचय दिया।

व्याख्या: इस पंक्ति से राजा जनक के अत्यंत विनम्र, कुलीन और शिष्ट व्यवहार का पता चलता है। एक राजा और सीता के पिता होने के नाते, वे जानते थे कि क्रोधित मुनि को कैसे शांत किया जाए और अतिथियों का स्वागत कैसे किया जाता है। वे स्वयं भी परशुराम जी के आगे सिर झुकाते हैं और सीता जी को भी बुलाकर उनके पैर छुआते हैं। संकट के समय भी अपनों से बड़ों को पूरा मान-सम्मान देना उनकी महानता और उत्तम संस्कारों (शिष्टता) को दर्शाता है।

3. “अति रिस बोले बचन कठोरा” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था-

(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना

(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना

(ग) शिव-धनुष का खंडित होना

(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति

सही विकल्प: (ग) शिव-धनुष का खंडित होना

उत्तर: परशुराम जी भगवान शिव के परम भक्त और शिष्य थे। स्वयंवर की सभा में अपने गुरु शिव के विशाल धनुष को टूटा हुआ (खंडित) देखकर वे अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाए और कठोर वचन बोलने लगे।

व्याख्या: मुनि परशुराम जी के अचानक इस कदर क्रोधित होने और राजा जनक को डांटने का एकमात्र और मूल कारण शिव-धनुष का टूटना था। परशुराम जी शिव जी को अपना गुरु मानते थे और उस धनुष से उनकी गहरी आस्था जुड़ी थी। जैसे ही उन्हें समाचार मिला कि किसी ने शिव-धनुष तोड़ दिया है, वे आगबबूला हो गए। उन्हें लगा कि यह उनके गुरु का बहुत बड़ा अपमान है, इसलिए वे अत्यंत क्रोध में आकर जनक से कड़े शब्द कहते हैं।

4. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?

(क) कूटनीति और चतुराई

(ख) विनम्रता और मर्यादा

(ग) त्याग और समर्पण

(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास

सही विकल्प: (ख) विनम्रता और मर्यादा

उत्तर: श्री राम ने परशुराम जी के भयंकर क्रोध को देखकर बहुत ही शांत स्वर में कहा कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई सेवक होगा। यह कथन राम के धैर्य, अटूट विनम्रता और मर्यादित स्वभाव को सिद्ध करता है।

व्याख्या: जब पूरी सभा परशुराम के डर से थर-थर काँप रही थी और परशुराम अपराधी को ढूंढ रहे थे, तब श्रीराम ने आगे बढ़कर स्वयं को उनका एक अदना ‘दास’ (सेवक) बताया। वे चाहते तो अपनी वीरता का बखान कर सकते थे, परंतु उन्होंने अत्यंत शांत रहकर अपनी वाणी से परशुराम के क्रोध को शांत करने का प्रयास किया। यह उत्तर सबसे सटीक है क्योंकि यह दर्शाता है कि राम विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी मर्यादा नहीं भूलते और उनका चरित्र सौम्यता व विनम्रता से भरा है।

5. “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” लक्षमण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?

(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।

(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।

(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।

(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

सही विकल्प: (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

उत्तर: लक्ष्मण जी स्वभाव से अत्यंत उग्र, वीर और निडर थे। वे परशुराम के अत्यधिक क्रोध और अहंकार को देखकर बिल्कुल नहीं डरे, बल्कि उनका उपहास उड़ाते हुए उन्हें युद्ध के लिए चुनौती देना चाहते थे।

व्याख्या: लक्ष्मण जी परशुराम जी के अत्यधिक घमंड और राजाओं को बार-बार दी जा रही धमकियों से सहमत नहीं थे। उन्हें लगा कि परशुराम केवल अपनी वीरता की बड़ी-बड़ी डींगें मार रहे हैं। राम की विनम्रता के विपरीत, लक्ष्मण का मानना था कि क्षत्रिय कभी किसी के अनुचित क्रोध से नहीं डरते। इसलिए वे मुनि की बातों पर मुस्कुराकर उनका उपहास करते हैं और व्यंग्य बाणों के जरिए उन्हें यह जताते हैं कि वे उनसे डरने वाले नहीं हैं और उनके पराक्रम को सीधी चुनौती देते हैं।

मेरी समझ मेरे विचार – (पेज 157 के प्रश्न उत्तर)

नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए –

1. “अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?

उत्तर: यह पंक्ति सीता जी के संदर्भ में कही गई है । सभा में परशुराम जी के भयंकर क्रोध और उनके कठोर स्वभाव को सुनकर भयभीत सीता जी के लिए पल भर का समय भी एक कल्प (युग) के समान लंबा और कष्टदायी प्रतीत हो रहा था ।

व्याख्या: इस पंक्ति का मूल भाव अत्यधिक मानसिक व्याकुलता और डर के कारण समय का न कटना है। कविता में यह प्रसंग माता सीता के संदर्भ में आता है । जब सीता स्वयंवर की सभा में मुनि परशुराम शिव-धनुष के टूटने पर अत्यंत उग्र होकर राजा जनक को धमकियाँ दे रहे थे, तब उनका भयंकर रौद्र रूप देखकर सीता जी मन ही मन बहुत डर गईं । उस विकट परिस्थिति में श्रीराम के भविष्य को लेकर उनके मन में इतनी व्यग्रता थी कि उनके लिए आधा क्षण (अरध निमेष) भी एक कल्प यानी करोड़ों वर्षों के समान भारी और लंबा बीत रहा था ।

2. “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: परशुराम जी की इस भयानक चेतावनी को सुनकर पूरी सभा में गहरा डर फैल गया था। सभी राजा अपने प्राणों के भय से काँप उठे और मुनि के कोप से बचने के लिए मौन धारण कर गए ।

व्याख्या: परशुराम जी ने चेतावनी दी थी कि जिसने भी शिव-धनुष तोड़ा है, वह इस राज-समाज को छोड़कर तुरंत अलग हो जाए, नहीं तो यहाँ उपस्थित सभी राजा मेरे हाथों मारे जाएँगे । इस कठोर घोषणा का पूरी सभा पर अत्यंत खौफनाक प्रभाव पड़ा। वहाँ उपस्थित सभी क्षत्रिय राजा डर के मारे पूरी तरह व्याकुल हो गए और किसी में भी आगे बढ़कर उत्तर देने का साहस नहीं बचा । वे अपने प्राणों की रक्षा के लिए भयभीत होकर चुपचाप बैठ गए, जिससे पूरी सभा में सन्नाटा और घोर अशांति छा गई ।

3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: हमारी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए श्रीराम का ‘विनय’ का मार्ग ही सबसे उचित है, क्योंकि विनम्रता और मधुर वचनों से ही किसी के भयंकर गुस्से को नियंत्रित किया जा सकता है ।

व्याख्या: परशुराम जी के भयंकर क्रोध को शांत करने के लिए श्रीराम का ‘विनय’ और संयम का मार्ग ही सर्वथा श्रेष्ठ और व्यावहारिक है। लक्ष्मण जी के तीखे व्यंग्य और तर्क मुनि के गुस्से में घी का काम कर रहे थे, जिससे विवाद और अधिक बढ़ता चला गया । इसके विपरीत, श्रीराम ने अपनी मर्यादित वाणी, शांत स्वभाव और विनम्रता के जरिए परशुराम जी के अहंकार को चोट पहुँचाए बिना उनके उग्र स्वभाव को धीरे-धीरे पूरी तरह शांत कर दिया । इससे सिद्ध होता है कि विपरीत परिस्थितियों में हमेशा धैर्य और शालीनता ही काम आती है।

4. ‘हदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरा।’ श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?

उत्तर: यह पंक्ति श्रीराम के स्थिरप्रज्ञ, धैर्यवान, समतावादी और गंभीर व्यक्तित्व को दर्शाती है । वे सुख-दुख, लाभ-हानि या भय के समय भी अपने मन का संतुलन कभी नहीं खोते हैं ।

व्याख्या: श्रीराम के हृदय में न तो शिव-धनुष तोड़ने का कोई अहंकार या हर्ष था और न ही परशुराम के फरसे को देखकर कोई डर या विषाद था । यह अद्भुत गुण उनके उच्च भावनात्मक संतुलन, अद्वितीय आत्म-नियंत्रण और मानसिक दृढ़ता को प्रकट करता है । जहाँ पूरी सभा डर से काँप रही थी, लक्ष्मण जी गुस्से में तर्क कर रहे थे और परशुराम जी अहंकार में गरज रहे थे, वहाँ श्रीराम एकदम शांत और स्थिर थे । उनका यही शांत रस और गंभीर स्वभाव उन्हें इतिहास का ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ और सबसे अलग पात्र स्थापित करता है ।

मेरी कल्पना मेरे अनुमान – (पेज 157 के प्रश्न उत्तर)

नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना के आधार पर दीजिए (Imagination-Based Questions)

1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: मैं जनक की सभा में बैठा एक राजा था। जब मुनि परशुराम हाथ में भयानक फरसा लिए अत्यंत क्रोध में आए, तो पूरी सभा थर-थर काँपने लगी । सभी राजाओं ने डरकर उन्हें प्रणाम किया । श्रीराम की विनम्रता और लक्ष्मण के तीखे तर्कों के बाद अंततः परशुराम जी का गुस्सा शांत हुआ और वे सभा से चले गए ।

व्याख्या: स्वयंवर की सभा में अचानक भृगुवंशी परशुराम जी का आगमन हुआ, उनका वेश अत्यंत डरावना और क्रोध से भरा था । उन्हें देखते ही हमारे प्राण सूख गए और हम अपनी जान बचाने के लिए अपने पिता का नाम लेकर उनके चरणों में गिर पड़े । जब उन्होंने शिव-धनुष टूटने पर पूरी सभा को नष्ट करने की धमकी दी, तब लक्ष्मण जी ने मुस्कुराते हुए उनसे शास्त्रार्थ और व्यंग्य बाणों से मुकाबला किया । अंत में, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के शांत स्वभाव, मीठे वचनों और गुरु विश्वामित्र के समझाने पर मुनि का महान क्रोध शांत हुआ और सभा में शांति बहाल हुई ।

2. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?

(संकेत— सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)

उत्तर: राजा जनक को परशुराम के सामने डर के मारे चुप देखकर अन्य दुष्ट राजा मन ही मन इसलिए खुश हो रहे थे क्योंकि वे स्वयंवर में धनुष न तोड़ पाने के कारण जनक और रघुवंशियों से ईर्ष्या रखते थे।

व्याख्या: यह पंक्ति मानव स्वभाव की एक कड़वी सच्चाई और विकृत मानसिकता को उजागर करती है जिसे हम ‘परपीड़न’ या दूसरों के दुख में सुखी होना कहते हैं । सभा में उपस्थित अधिकांश राजा शिव-धनुष को हिला तक नहीं पाए थे और अपनी हार से अपमानित महसूस कर रहे थे। जब उन्होंने देखा कि सर्वशक्तिमान राजा जनक भी परशुराम के डर से मौन हैं, तो उनके भीतर छिपी ईर्ष्या और कुटिलता जाग उठी । उन्हें लगा कि जनक का भी उनके जैसा ही अपमान हो रहा है, जो उनके अहंकारी मन को झूठी संतुष्टि दे रहा था।

विधा से संवाद — कविता का सौंदर्य – (पेज 157 के प्रश्न उत्तर)

नीचे कविता के संवादों की मुख्य विशेषताएँ और उन्हें दर्शाने वाली पंक्तियाँ दी गई हैं:

1. राम की विनम्रता

उत्तर: “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।”

व्याख्या: जब मुनि परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर शिव-धनुष तोड़ने वाले का नाम पूछ रहे थे, तब श्रीराम ने अपनी अद्भुत मर्यादा और शालीनता का परिचय दिया । उन्होंने स्वयं को परशुराम जी का एक साधारण सेवक (दास) बताकर बात की । यह पंक्ति दर्शाती है कि राम विपरीत परिस्थितियों में भी संयम नहीं खोते और बड़ों के प्रति सदैव आदर भाव रखते हैं ।

2. परशुराम का रौद्र रूप

उत्तर: “रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।”

व्याख्या: लक्ष्मण जी के व्यंग्य वचनों को सुनकर भृगुकुल के केतु मुनि परशुराम जी अपने भयंकर गुस्से में आ गए । उन्होंने फरसा तानकर लक्ष्मण को चेतावनी दी कि हे राजा के बालक! तू काल के वश में होने के कारण संभलकर नहीं बोल रहा है । संपूर्ण संसार में विख्यात भगवान शिव के इस महान धनुष की तुलना तू बचपन की साधारण धनुहियों से कर रहा है!

3. लक्ष्मण का प्रत्युत्तर

उत्तर: “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।”

व्याख्या: लक्ष्मण जी स्वभाव से अत्यंत वीर और निडर थे । वे परशुराम जी की धमकियों से डरे बिना मुस्कुराते हुए उन्हें प्रत्युत्तर देते हैं कि हे मुनि श्रेष्ठ! बचपन (लरिकाई) में खेल-खेल में हमने ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी धनुहियाँ तोड़ी हैं , तब तो आपने हम पर कभी ऐसा भयंकर क्रोध (रिस) नहीं किया! फिर इस पुराने धनुष पर आपकी इतनी ममता क्यों है?

4. पौराणिक संदर्भ

उत्तर: “सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।”

व्याख्या: कविता में संवादों को प्रभावशाली बनाने के लिए प्राचीन कथाओं का सहारा लिया गया है, जिसे पौराणिक संदर्भ कहते हैं। यहाँ परशुराम जी शिव-धनुष तोड़ने वाले को अपना सबसे बड़ा शत्रु बताते हुए ‘सहस्रबाहु’ (हजार भुजाओं वाले राजा कार्तवीर्य अर्जुन) का उदाहरण देते हैं, जिसका वध परशुराम जी ने अतीत में किया था। यह संदर्भ मुनि के भयंकर पराक्रम और उनकी पुरानी शत्रुता को रेखांकित करता है।

5. नाटकीयता (Dramatic Elements)

उत्तर: “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।”

व्याख्या: नाटकीयता का अर्थ है कविता में ऐसे दृश्य या हाव-भाव पैदा करना जिससे वह किसी नाटक के मंच जैसी जीवंत लगे। जब परशुराम जी क्रोध में गरज रहे थे, ठीक उसी समय लक्ष्मण जी का अचानक बीच में ‘मुस्कुराना’ और उपहास उड़ाते हुए ‘व्यंग्य वचनों में उत्तर देना’ पूरी परिस्थिति में एक जबरदस्त नाटकीय मोड़ (ट्विस्ट) लाता है। इससे पाठकों का कौतूहल और आनंद बहुत बढ़ जाता है।

भाव-पहचान एवं विश्लेषण – (पेज 158 के प्रश्न उत्तर)

नीचे दी गई स्थितियों और पात्रों की मनःस्थिति का सटीक विश्लेषण इस प्रकार है:

प्रसंग: “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।”

प्रश्न: परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय?

उत्तर: राजा जनक का यह मौन भय और विवेक दोनों का मिला-जुला रूप था। वे परशुराम के कठोर स्वभाव और विनाशकारी क्रोध से भली-भांति परिचित थे, इसलिए उन्होंने चुप रहना ही सबसे सही समझा ।

व्याख्या: शिव-धनुष के खंडित होने पर जब परशुराम जी ने अत्यंत क्रोध में आकर कड़े स्वर में पूछा कि यह धनुष किसने तोड़ा है, तब राजा जनक भय के कारण एकदम चुप रह गए । उनका यह निर्णय बहुत विवेकपूर्ण भी था । वे जानते थे कि क्रोध से भरे ऋषि को उस समय उत्तर देना आग में घी डालने जैसा होगा । अपनी पुत्री सीता के भविष्य और सभा में उपस्थित अन्य राजाओं की रक्षा के लिए उनका शांत रहना ही उस समय सबसे उत्तम और विवेकपूर्ण कदम था ।

विस्तृत विश्लेषण (किताब में दिए गए 5 नियमों के आधार पर विस्तृत विश्लेषण):

1. संदर्भ (Context)

यह पंक्ति सीता स्वयंवर के उस मुख्य प्रसंग से है जहाँ श्रीराम द्वारा शिव-धनुष के खंडित होने का समाचार सुनकर मुनि परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर सभा में आते हैं । वे पूरी सभा को नष्ट करने और अपराधी को सामने लाने के लिए गरज रहे होते हैं । ऐसी तनावपूर्ण स्थिति में राजा जनक से उत्तर की अपेक्षा की जा रही थी, परंतु वे पूरी तरह मौन रहते हैं ।

2. कारण से भाव से परिणाम तक का क्रम (Analysis Process)

• कारण (Why): परशुराम जी एक परम प्रतापी, क्षत्रिय-हंता और अत्यंत क्रोधी स्वभाव के मुनि थे, जिनका गुस्सा उस समय सातवें आसमान पर था ।

• भाव (Emotions): राजा जनक के मन में अपनी पुत्री सीता के भविष्य को लेकर ‘भय’ और ‘चिंता’ का गहरा भाव था । वे जानते थे कि गुस्से में विवेक खो चुके व्यक्ति के सामने कुछ भी बोलना आग में घी डालने जैसा होगा।

• परिणाम (Impact): उनके इस मौन का परिणाम यह हुआ कि विवाद तुरंत आगे नहीं बढ़ा। जनक के चुप रहने से श्रीराम को आगे बढ़कर अपनी मधुर वाणी में बात संभालने का अवसर मिला, जिससे अंततः पूरी सभा का विनाश टल गया ।

3. निष्कर्ष (Conclusion)

इससे स्पष्ट होता है कि राजा जनक का मौन केवल भयजनित कायरता नहीं थी, बल्कि एक कुशल और दूरदर्शी शासक द्वारा सोच-समझकर लिया गया विवेकपूर्ण निर्णय था । जहाँ एक राजा का अनुचित अहंकार पूरी सभा को युद्ध की ओर धकेल सकता था, वहीं जनक ने शांत रहकर अपनी प्रजा और परिवार की रक्षा की।

काव्य-पंक्ति और भाव – (पेज 159 के प्रश्न उत्तर)

प्रश्न: “रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।”

(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता? (ख) निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे- परशुराम, राजा जनक, लक्ष्मण, राम, सभा में उपस्थित अन्य राजा?

उत्तर: (क) इन पंक्तियों को मंच पर बोलते समय हमारे चेहरे पर तीव्र क्रोध, आँखें बड़ी और भौहें तनी हुई (रौद्र रस) का भाव होना चाहिए।

(ख) पात्रों के प्रदर्शित भाव: परशुराम = अत्यधिक क्रोध (रौद्र), राजा जनक = व्याकुलता और गंभीरता, लक्ष्मण = निडरता और व्यंग्य (हास्य/वीर), राम = परम शांति और विनम्रता, अन्य राजा = गहरा डर (भयानक रस) ।

व्याख्या: रामचरितमानस के इस नाट्य प्रसंग में हर पात्र अपनी मनःस्थिति के अनुसार एक विशेष भाव का प्रतिनिधित्व कर रहा है। परशुराम जी का पूरा चरित्र इस समय अहंकार और गुस्से से भरा है, इसलिए वे रौद्र भाव में दिखेंगे। लक्ष्मण जी बिना किसी भय के उनका उपहास कर रहे हैं, इसलिए उनके चेहरे पर वीरता और व्यंग्य की मुस्कान होगी। राजा जनक अपनी पुत्री और सभा की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, जबकि अन्य राजा अपनी जान के डर से काँप रहे हैं। इन सबके बीच श्रीराम का स्वभाव अत्यंत शांत और संतुलित है, जो उनकी महानता को दर्शाता है।

विषयों से संवाद – (पेज 159 के प्रश्न उत्तर)

1. सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।

उत्तर: हमें अपने दैनिक जीवन में विकट परिस्थितियों, दूसरों के अकारण क्रोध करने पर, वाद-विवाद प्रतियोगिता में, अपने से बड़ों के सामने और किसी संकट या मतभेद के समय धैर्य, संयम और विनम्रता जैसी विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है।

व्याख्या: एक कुशल शासक या आदर्श मनुष्य वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना आपा न खोए। जब हमारे सामने कोई व्यक्ति अत्यधिक गुस्से में बात कर रहा हो, तब हमें राम की तरह धीर-गंभीर और शांत रहकर उसकी बात सुननी चाहिए, क्योंकि गुस्से का जवाब गुस्से से देने पर बात हमेशा बिगड़ती है। इसके अलावा स्कूल में, खेल के मैदान में या परिवार में जब कभी कोई मतभेद की स्थिति पैदा होती है, तब समझदारी और मधुर वाणी (विनम्रता) के प्रयोग से बड़े से बड़े विवाद को आसानी से सुलझाया जा सकता है।

2. प्राचीन भारतीय समाज में वर-चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। ऐसी किसी एक पौराणिक-ऐतिहासिक घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।

उत्तर: पौराणिक इतिहास में महाकाव्य ‘महाभारत’ के अंतर्गत पांचाल देश की राजकुमारी द्रौपदी के स्वयंवर का प्रसिद्ध प्रसंग मिलता है, जहाँ अर्जुन ने कठिन लक्ष्य को भेदकर द्रौपदी से विवाह किया था।

व्याख्या: प्राचीन काल में राजा-महाराजा अपनी पुत्रियों के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन करते थे, जिसमें एक कठिन शर्त रखी जाती थी। द्रौपदी के स्वयंवर में राजा द्रुपद ने शर्त रखी थी कि नीचे पानी के कुंड में देखकर, ऊपर घूमती हुई मछली की आँख पर जो भी तीर से निशाना साधेगा, द्रौपदी उसी के गले में वरमाला डालेगी। देश-विदेश के कई राजा इस प्रयास में असफल रहे, परंतु पांडु पुत्र अर्जुन ने अपनी अद्भुत तीरंदाजी का परिचय देते हुए उस कठिन लक्ष्य को भेद दिया और स्वयंवर की शर्त को पूरा कर द्रौपदी से विवाह किया।

सृजन – (पेज 160 के प्रश्न उत्तर)

1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।

उत्तर:

• माता सुनयना: हे पुत्री सीता! मुनि परशुराम का यह भयंकर क्रोध देखकर मेरा हृदय काँप रहा है। विधाता ने हमारी बनी-बनाई बात बिगाड़ दी है। अब तुम्हारे भविष्य का क्या होगा?

• सीता: हे माता! मेरे मन में भी भारी शंका और भय है। रघुनाथ जी ने तो केवल शिव-धनुष तोड़ा है, फिर मुनि उन पर इतना गुस्सा क्यों कर रहे हैं? मेरा एक-एक पल युगों के समान बीत रहा है।

व्याख्या: यह मौन संवाद स्वयंवर सभा में अचानक उत्पन्न हुए संकट के समय माता और पुत्री की गहरी मानसिक व्याकुलता और चिंता को प्रकट करता है । माता सुनयना अपनी पुत्री के विवाह और सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं, क्योंकि परशुराम जी पूरी सभा को नष्ट करने की धमकी दे रहे हैं । वहीं दूसरी ओर, माता सीता का हृदय भय और प्रेम के द्वंद्व में फंसा हुआ है । वे मन ही मन श्रीराम की कुशलता की प्रार्थना कर रही हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि अत्यधिक तनाव के क्षणों में शब्दों से ज्यादा आँखों और मौन के माध्यम से भावनाओं का आदान-प्रदान होता है।

2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए। (संकेत– लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)

उत्तर: सभा में हो रहे संवाद को सुनकर सीता जी के मन में डर, शंका, गर्व और हँसी के मिले-जुले भाव आ रहे थे । वे परशुराम के क्रोध से डर रही थीं , लेकिन लक्ष्मण जी के निडर और व्यंग्यपूर्ण तर्कों को सुनकर उन्हें गर्व और भीतर ही भीतर हँसी भी आ रही थी ।

व्याख्या: सीता जी के दृष्टिकोण से इस पूरी घटना का विश्लेषण करें तो उनके मन में भावनाओं का एक चक्रवात चल रहा था । सर्वप्रथम, परशुराम जी के भयंकर रूप और कठोर वचनों को सुनकर उनके मन में ‘भय’ और ‘चिंता’ का भाव जागा कि कहीं श्रीराम पर कोई संकट न आ जाए । परंतु, जैसे ही लक्ष्मण जी ने आगे बढ़कर मुस्कुराते हुए मुनि की धमकियों का करारा जवाब दिया, तो सीता जी का डर थोड़ा कम हुआ। उन्हें अपने होने वाले देवर लक्ष्मण के पराक्रम और निडरता पर ‘गर्व’ महसूस हुआ और मुनि की बेबसी पर मन ही मन ‘हँसी’ भी आई । अंततः, श्रीराम के शांत और धीर-गंभीर व्यवहार को देखकर उनके मन में अपने आराध्य के प्रति अगाध श्रद्धा और ‘विश्वास’ और मजबूत हो गया ।

3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।

उत्तर: मैं अपना परिचय देते समय अपनी झूठी वीरता या अहंकार का प्रदर्शन करने के बजाय अपनी शिक्षा, मानवीय मूल्यों, सरल स्वभाव और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का उल्लेख करना उचित समझूँगा।

व्याख्या: जनक की सभा में आए राजाओं का परिचय उनके अहंकार और घमंड को दर्शाता था । इसके विपरीत, एक आधुनिक और सभ्य नागरिक के रूप में मेरा परिचय सादगी और आत्मसम्मान पर आधारित होगा। उदाहरण के लिए: “मेरा नाम [यहाँ छात्र अपना नाम लिख सकते हैं] है। मैं अपने जीवन में अनुशासन, सत्यनिष्ठा और बड़ों के प्रति सम्मान (विनम्रता) को सबसे बड़ा गुण मानता हूँ। कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय शांत रहकर समाधान ढूंढना मेरा स्वभाव है। मैं अपनी शिक्षा का उपयोग समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और जरूरतमंदों की मदद करने के लिए करना चाहता हूँ।” यह परिचय व्यक्ति के उदात्त और मर्यादित चरित्र को प्रकट करता है

गद्य-रूप (चौपाई को सरल गद्य में लिखना)

प्रश्न: नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए-

अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।। सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।”

उत्तर: सरल गद्य – रूप में  – परशुराम जी के भयंकर क्रोध के कारण अत्यधिक डरकर राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे पा रहे हैं। यह देखकर सभा में उपस्थित दुष्ट और कुटिल राजा मन ही मन बहुत खुश हो रहे हैं। देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी स्त्री-पुरुष अपने हृदयों में भारी डर और कष्ट लेकर अत्यंत चिंतित हो रहे हैं।

व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी की इन चौपाइयों में स्वयंवर सभा के उस भयावह दृश्य का वर्णन है जब शिव-धनुष टूटने पर परशुराम जी गर्जना कर रहे थे। मुनि के फरसे और उनके कठोर स्वभाव से भयभीत होकर राजा जनक मौन धारण कर लेते हैं। जनक को संकट में देखकर जो राजा धनुष नहीं तोड़ पाए थे, वे अपनी ईर्ष्या के कारण खुश होते हैं। वहीं दूसरी ओर, नगर के आम लोग, देवता और ऋषि-मुनि इस बात से बेहद डर जाते हैं कि कहीं मुनि के क्रोध के कारण पूरी सभा का विनाश न हो जाए।

भाषा से संवाद (व्याकरण की बात) – (पेज 160 के प्रश्न उत्तर)

प्रश्न: कविता में आए अवधी शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए।

उत्तर: पाठ में प्रयुक्त अवधी शब्दों के आधुनिक खड़ी बोली हिंदी रूप निम्नलिखित तालिका के अनुसार हैं:

क्र. सं.अवधी शब्दखड़ी बोली (मानक हिंदी) रूप
1.भुआलाराजा, भूपाल
2.बहोरिदोबारा, फिर से
3.सीयसीता
4.ढोटापुत्र, बेटा, बालक
5.चापखंडधनुष के टुकड़े
6.बेगिशीघ्र, जल्दी
7.महिपृथ्वी, धरती
8.लरिकाईलड़कपन, बचपन
9.रिसक्रोध, गुस्सा
10.तिपुरारित्रिपुरारी, भगवान शिव

गतिविधियाँ — संवाद पहचान तालिका (Who Said To Whom) – (पेज 160 के प्रश्न उत्तर)

नीचे दी गई तालिका में पाठ के मुख्य कथनों और उनसे संबंधित सही पात्रों की सूची दी गई है:

कथनरामलक्ष्मणपरशुरामजनकसीता की माता (सुनैना)
शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है।सही पात्र ()
विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी।सही पात्र ()
सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे।सही पात्र ()
इस कारण ये सब राजा आए हैं।सही पात्र ()
बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं।सही पात्र ()
क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते?सही पात्र ()
कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है?सही पात्र ()
इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों!सही पात्र ()

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ (लाइन-बाय-लाइन शब्दार्थ, भाव और व्याख्या)

प्रथम 4 लाइन्स:

देखत (देखकर) भृगुपति (भृगुकुल के स्वामी परशुराम) बेषु (वेश-भूषा) कराला (भयानक)। उठे सकल भय (सब कोई भय से उठे) बिकल भुआला (व्याकुल होकर राजागण)॥ पितु समेत (पिता के साथ) कहि कहि निज नामा (अपना-अपना नाम ले-लेकर)। लगे करन सब दंड प्रनामा (सबकोई उन्हें दण्डवत प्रणाम करने लगे)॥

भाव: परशुराम जी के भयानक रूप को देखकर सभा के सभी राजा डर के मारे व्याकुल होकर उठ खड़े हुए और अपने पिताओं के साथ अपना नाम बता-बताकर उन्हें दंडवत प्रणाम करने लगे।

व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी वर्णन करते हैं कि जैसे ही सीता स्वयंवर की सभा में भृगुवंशी परशुराम जी का अत्यंत उग्र और भयानक रूप दिखाई दिया, वैसे ही वहाँ उपस्थित सभी राजा भय से काँप उठे। अपनी जान बचाने और परशुराम जी के क्रोध को शांत करने के लिए सभी राजा मर्यादा भूलकर खड़े हो गए। वे अपने कुल और पिता का नाम आदरपूर्वक लेकर परशुराम जी के चरणों में गिरकर साष्टांग प्रणाम करने लगे ताकि उन्हें उनके गुस्से का शिकार न होना पड़े।

अगली 4 लाइन्स:

जेहि सुभायँ (जिस स्वाभाविक दृष्टि से) चितवहिं (देखते थे) हितु जानी (भलाई समझकर)। सो जानइ (वह समझता था) जनु आई खुटानी (मानो उसकी मौत आ गई हो)॥ जनक बहोरि (राजा जनक ने फिर) आइ सिरु नावा (आकर सिर झुकाया)। सीय बोलाइ (सीता जी को बुलाकर) प्रनामु करावा (प्रणाम करवाया)॥

भाव: परशुराम जी स्वभाव से ही जिसकी तरफ प्रेम से भी देखते थे, वह राजा अपनी मौत निकट समझता था। इसके बाद राजा जनक ने आकर सिर झुकाया और सीता जी को बुलाकर प्रणाम करवाया।

व्याख्या: परशुराम जी का क्रोध उस समय इतना प्रचंड था कि यदि वे अपनी स्वाभाविक दृष्टि से किसी राजा को भलाई की भावना से भी देखते थे, तो वह भयभीत राजा यही समझता था कि अब उसका बुरा वक्त आ गया है। इस विषम स्थिति को सँभालने के लिए राजा जनक आगे बढ़े और उन्होंने परशुराम जी के सामने अत्यंत विनम्रता से अपना सिर झुकाया। इसके तुरंत बाद उन्होंने पुत्री सीता को भी बुलाकर परशुराम जी से आशीर्वाद लेने के लिए प्रणाम करवाया।

अगली 4 लाइन्स:

आसिष दीन्हि (आशीर्वाद दिया) सखीं हरषानीं (सखियाँ आनंदित हुईं)। निज समाज (अपने सहेलियों के समूह में) लै गईं सयानीं (चतुर सखियाँ ले गईं)॥ बिस्वामित्रु मिले (विश्वामित्र जी फिर मिले) पुनि आई (पास आकर)। पद सरोज (चरण कमलों में) मेले दोउ भाई (दोनों भाइयों को प्रणाम करवाया)॥

भाव: परशुराम जी ने सीता जी को आशीर्वाद दिया जिससे सखियाँ खुश हो गईं और चतुर सखियाँ उन्हें सहेलियों के समूह में ले गईं। फिर विश्वामित्र जी मिले और उन्होंने दोनों भाइयों को उनके चरण कमलों में लगा दिया।

व्याख्या: परशुराम जी ने सीता जी के मस्तक पर हाथ रखकर उन्हें सौभाग्य का आशीर्वाद दिया, जिसे देखकर वहाँ उपस्थित सभी सखियाँ आनंद से भर गईं। इसके बाद चतुर सखियाँ सीता जी को वापस अंतःपुर के समाज में ले गईं। माहौल को और शांत करने के लिए मुनि विश्वामित्र आगे आए और उन्होंने परशुराम जी का अभिवादन किया। इसके साथ ही उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को परशुराम जी के चरण कमलों को स्पर्श करने के लिए उनके सामने प्रस्तुत किया।

अगली 4 लाइन्स:

रामु लखनु (राम और लक्ष्मण) दसरथ के ढोटा (दशरथ जी के पुत्र)। दीन्हि असीस (आशीर्वाद दिया) देखि भल जोटा (सुंदर जोड़ी को देखकर)॥ रामहि चितइ (श्रीराम को देखकर) रहे थकि लोचन (आँखें थकी की थकी रह गईं)। रूप अपार (अत्यंत सुंदर रूप) मार मद मोचन (कामदेव के घमंड को चूर करने वाला)॥

भाव: मुनि ने जब देखा कि ये राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, तो इस सुंदर जोड़ी को देखकर उन्होंने आशीर्वाद दिया। श्रीराम के अपार सौंदर्य को देखकर, जो कामदेव के घमंड को भी चूर करने वाला था, परशुराम जी की आँखें थकी की थकी रह गईं।

व्याख्या: जब विश्वामित्र जी ने परिचय दिया कि ये महाराज दशरथ के वीर पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, तो परशुराम जी ने उन दोनों भाइयों की दिव्य जोड़ी को देखकर उन्हें मन से आशीर्वाद दिया। इसके बाद जब परशुराम जी की दृष्टि श्रीराम के मनमोहक और अलौकिक रूप पर पड़ी, तो वे एकटक देखते रह गए। श्रीराम का सौंदर्य इतना अपार था कि वह साक्षात् कामदेव के अहंकार को भी नष्ट करने वाला था, जिसे देखकर परशुराम जी का क्रोध कुछ पल के लिए विस्मय में बदल गया।

अंतिम 4 लाइन्स:

बहुरि बिलोकि (फिर से देखकर) बिदेह सन (राजा जनक से) कहहु काह अति भीर (पूछा कि बताओ यह भारी भीड़ कैसी है)। पूछत जानि अजान जिमि (सब कुछ जानते हुए भी अनजान की तरह पूछते हैं) ब्यापेउ कोपु सरीर (और उनका पूरा शरीर क्रोध से भर गया)॥

भाव: फिर जनक की ओर देखकर परशुराम जी ने पूछा कि बताओ यहाँ यह भारी भीड़ कैसी है? वे सब कुछ जानते हुए भी अनजान की तरह पूछ रहे थे और उनका पूरा शरीर क्रोध से भर गया था।

व्याख्या: श्रीराम के रूप को देखने के बाद परशुराम जी ने अपनी दृष्टि घुमाई और राजा जनक की ओर रुख किया। उन्होंने कड़कती आवाज़ में राजा जनक से पूछा कि तुम्हारी इस सभा में राजाओं की इतनी भारी भीड़ क्यों लगी हुई है और यहाँ क्या उत्सव चल रहा है? यद्यपि शिवजी का धनुष टूटने की टंकार से परशुराम जी सब कुछ जान चुके थे, फिर भी वे अनजान बनकर जनक से प्रश्न कर रहे थे और ऐसा पूछते समय उनका पूरा शरीर गुस्से से काँप रहा था।

(भाग- 2: शब्दार्थ, भाव और व्याख्या)

प्रथम 4 लाइन्स:

समाचार कहि (वृत्तांत कहकर) जनक सुनाए (राजा जनक ने सुनाया)। जेहि कारन (जिस कारण से) महीप (राजागण) सब आए (यहाँ आए थे)॥ सुनत बचन (बातें सुनते ही) फिरि अनत निहोरे (दूसरी ओर मुड़कर देखा)। देखे चापखंड (धनुष के टुकड़े) महि (धरती पर) डारे (पड़े हुए)॥

भाव: राजा जनक ने परशुराम जी को वह सारा वृत्तांत और कारण कहकर सुनाया जिसके लिए सभी राजा वहाँ एकत्र हुए थे। यह बात सुनते ही परशुराम जी ने दूसरी ओर देखा तो धनुष के टुकड़े पृथ्वी पर पड़े हुए दिखाई दिए।

व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी वर्णन करते हैं कि जब परशुराम जी ने भीड़ के बारे में पूछा, तब राजा जनक ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक उन्हें स्वयंवर का पूरा समाचार और धनुष तोड़ने की प्रतिज्ञा का कारण विस्तार से समझाया। जनक की ये बातें सुनते ही परशुराम जी का ध्यान सभा के मध्य की ओर गया। उन्होंने जब घूमकर देखा, तो शिवजी के पिनाक धनुष के विशाल टुकड़े धरती पर बिखरे पड़े थे, जिसे देखकर उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया।

अगली 4 लाइन्स:

अति रिस (अत्यंत क्रोध में) बोले बचन कठोरा (कठोर वचन बोले)। कहु जड़ (कह रे मूर्ख) जनक धनुष कै तोरा (जनक कि धनुष किसने तोड़ा है)॥ बेगि देखाउ (जल्दी से दिखा) मूढ़ (हे मूर्ख) न त आजू (नहीं तो आज)। उलटउँ महि (धरती को पलट दूँगा) जहँ लहि (जहाँ तक) तव राजू (तुम्हारा राज्य है)॥

भाव: अत्यंत क्रोध में भरकर परशुराम जी कठोर वचन बोले कि हे मूर्ख जनक! बताओ यह धनुष किसने तोड़ा है? उस मूर्ख को मेरे सामने जल्दी से दिखाओ, नहीं तो आज मैं तुम्हारे पूरे राज्य की धरती को उलट दूँगा।

व्याख्या: धनुष के टुकड़ों को देखते ही परशुराम जी का गुस्सा भड़क उठा और वे पूरी सभा को डराते हुए बेहद कड़े स्वर में चिल्लाए। उन्होंने राजा जनक को झिड़कते हुए कहा कि हे अज्ञानी जनक! मुझे तुरंत उस व्यक्ति का नाम बताओ जिसने इस शिव धनुष को तोड़ने का दुस्साहस किया है। उस पापी को मेरे सामने तुरंत पेश करो, अन्यथा क्रोध में आकर आज मैं तुम्हारे पूरे साम्राज्य की भूमि को तहस-नहस करके उलट-पुलट दूँगा।

अगली 4 लाइन्स:

अति डरु (अत्यंत डर के कारण) उतरु देत (उत्तर देते) नृपु नाहीं (राजा जनक से नहीं बन रहा था)। कुटिल भूप (दुष्ट राजागण) हरषे मन माहीं (अपने मन में खुश हो रहे थे)॥ सुर मुनि (देवता और मुनि) नाग नगर नर नारी (नाग तथा नगर के स्त्री-पुरुष)। सोचहिं सकल (सभी चिंता करने लगे) त्रास उर भारी (हृदय में भारी डर समा गया)॥

भाव: अत्यधिक डर के मारे राजा जनक मुँह से कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे, जिसे देखकर सभा में उपस्थित दुष्ट राजा मन ही मन बड़े खुश हो रहे थे। देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी नर-नारी भारी डर के कारण व्याकुल होकर चिंता करने लगे।

व्याख्या: परशुराम जी की ऐसी विनाशकारी गर्जना सुनकर राजा जनक भीतर तक काँप गए और डर के कारण उनके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। स्वयंवर में हारे हुए जो कपटी और दुष्ट राजा वहाँ बैठे थे, वे जनक की यह दशा देखकर मन ही मन खुश हो रहे थे कि अब धनुष तोड़ने वाले को सज़ा मिलेगी। परशुराम जी के इस विकराल रूप को देखकर आकाश में स्थित देवता, ऋषि-मुनि और जनकपुर के सभी आम नागरिक अनिष्ट की आशंका से बुरी तरह डर गए।

अगली 4 लाइन्स:

मन पछिताति (मन में पछता रही थीं) सीय महतारी (सीता जी की माता)। बिधि अब (विधाता ने अब) सँवरी बात बिगारी (बनी हुई बात बिगाड़ दी)॥ भृगुपति कर (परशुराम जी का) सुभाउ सुनि सीता (स्वभाव सुनकर सीता जी)। अरध निमेष (आधा पल भी) कलप सम बीता (एक कल्प यानी युग के समान बीत रहा था)॥

भाव: सीता जी की माता मन ही मन पछता रही थीं कि विधाता ने अब बनी-बनाई बात को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। परशुराम जी के उग्र स्वभाव के बारे में सुनकर सीता जी के लिए आधा पल भी एक युग के समान भारी होकर बीत रहा था।

व्याख्या: इस भयानक माहौल को देखकर सीता जी की माता महारानी सुनयना गहरे अवसाद और चिंता में डूब गईं। उन्हें लगने लगा कि भगवान ने श्रीराम द्वारा धनुष तोड़े जाने पर जो बात बनाई थी, वह इस मुनि के आने से फिर बिगड़ गई है। दूसरी ओर, जब सीता जी ने परशुराम जी के इस अत्यंत क्रोधी और संहारक स्वभाव के बारे में सुना, तो वे भी भीतर से डर गईं। उनके मन में श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम था, जिसके कारण डर के मारे उनका आधा क्षण भी एक पूरे युग जितना लंबा और कष्टदायी महसूस हो रहा था।

अंतिम 4 लाइन्स:

सभय बिलोके (भयभीत होकर देखा) लोग सब (सभी लोगों ने) जानि जानकी भीरू (जानकी जी को डरी हुई जानकर)। हृदयँ न हरषु (हृदय में न हर्ष था) बिषादु कछु (और न ही कोई दुःख) बोले श्रीरघुबीरू (तब श्री रामचंद्र जी बोले)॥

भाव: सभा के सभी लोगों ने भयभीत होकर परशुराम जी की ओर देखा। तब जानकी जी को डरी हुई जानकर और अपने हृदय में बिना किसी हर्ष या शोक के शांत भाव से श्री रामचंद्र जी आगे बढ़कर बोले।

व्याख्या: पूरी सभा में सन्नाटा पसरा हुआ था और सभी लोग डर के मारे आँखें नीचे किए परशुराम जी के अगले कदम को देख रहे थे। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने जब देखा कि मुनि के क्रोध के कारण पूरी सभा के साथ-साथ सीता जी भी अत्यधिक भयभीत और व्याकुल हो चुकी हैं, तो उन्होंने स्थिति को सँभालने का निश्चय किया। श्रीराम के मन में मुनि के क्रोध को देखकर न तो कोई डर था, न कोई घमंड और न ही कोई दुख; वे पूरी तरह शांतचित्त होकर परशुराम जी का सामना करने के लिए मधुर वाणी में बोले।

 (भाग- 3: शब्दार्थ, भाव और व्याख्या)

प्रथम 4 लाइन्स:

नाथ (हे स्वामी) संभुधनु (शिवजी का धनुष) भंजनिहारा (तोड़ने वाला)। होइहि (होगा) केउ एक (कोई एक) दास तुम्हारा (आपका ही सेवक)॥ आयसु काह (क्या आज्ञा है) कहिअ किन मोही (मुझसे क्यों नहीं कहते)। सुनि रिसाइ (यह सुनकर क्रोधित होकर) बोले मुनि कोही (क्रोधी मुनि बोले)॥

भाव: श्रीराम ने परशुराम जी से अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहा कि हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, आप मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि और अधिक गुस्सा होकर बोले।

व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी वर्णन करते हैं कि जब परशुराम जी जनक के राज्य को नष्ट करने की धमकी दे रहे थे, तब श्रीराम ने आगे बढ़कर सभा का माहौल शांत करने का प्रयास किया। उन्होंने अत्यंत मधुर वाणी में कहा कि शिवजी का धनुष तोड़ने वाला कोई बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि आपका ही कोई अनन्य भक्त या सेवक होगा। आप अपनी आज्ञा मुझसे कहिए। श्रीराम की इस अति विनम्रता को सुनकर परशुराम जी का गुस्सा शांत होने के बजाय और भड़क गया और वे अत्यंत कड़े स्वर में उत्तर देने लगे।

अगली 4 लाइन्स:

सेवकु सो (सेवक तो वह है) जो करै सेवकाई (जो सेवा का काम करे)। अरि करनी (शत्रुता का काम) करि (करके) करिअ लराई (जो केवल लड़ाई ही मोल ले)॥ सुनहु राम (हे राम सुनो) जेहिं सिवधनु तोरा (जिसने भी शिवजी का यह धनुष तोड़ा है)। सहसबाहु सम (सहस्रबाहु राजा के समान) सो रिपु मोरा (वह मेरा कट्टर शत्रु है)॥

भाव: सेवक वही होता है जो सेवा का कार्य करता है, लेकिन जो शत्रुता का काम करे, उससे तो केवल लड़ाई ही करनी चाहिए। हे राम सुनो, जिसने भी शिवजी का यह धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा परम शत्रु है।

व्याख्या: परशुराम जी ने श्रीराम को डांटते हुए कहा कि जो व्यक्ति निष्काम भाव से गुरु और ब्राह्मणों की सेवा करता है, उसे सेवक कहते हैं। इस धनुष को तोड़ने वाले ने तो साक्षात् अपराध और शत्रुता का कार्य किया है, जिसका एकमात्र परिणाम केवल युद्ध और विनाश है। वे पूरी सभा को चेतावनी देते हुए बोले कि हे राम, कान खोलकर सुन लो, जिसने भी इस पूजनीय शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर इसे तोड़ा है, वह ठीक वैसे ही मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है जैसे प्राचीन काल में कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) था।

अगली 4 लाइन्स:

सो बिलगाउ (वह अलग होकर खड़ा हो जाए) बिहाइ समाजा (इस राजाओं के समाज को छोड़कर)। न त (नहीं तो) मारे जैहहिं (मारे जाएँगे) सब राजा (यहाँ उपस्थित सभी राजा)॥ सुनि मुनि बचन (मुनि के ऐसे वचनों को सुनकर) लखन मुसुकाने (लक्ष्मण जी मुस्कुराने लगे)। बोले परसुधरहि (और परशुराम जी का) अपमाने (अपमान करते हुए बोले)॥

भाव: इसलिए वह धनुष तोड़ने वाला व्यक्ति इस राजाओं के समाज को छोड़कर तुरंत अलग हो जाए, नहीं तो आज यहाँ उपस्थित सभी राजा मेरे हाथों मारे जाएँगे। मुनि के ऐसे वचनों को सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कुराने लगे और परशुराम जी का अपमान करते हुए बोले।

व्याख्या: परशुराम जी ने अपने फरसे को हवा में लहराते हुए कहा कि मैं निर्दोष राजाओं की हत्या नहीं करना चाहता, इसलिए जिसने भी यह अपराध किया है, वह चुपचाप इस स्वयंवर की सभा से बाहर निकल आए। यदि उसने ऐसा नहीं किया, तो उसके चक्कर में यहाँ बैठे संसार भर के सारे राजा मेरे क्रोध की अग्नि में भस्म हो जाएँगे। परशुराम जी की इस आत्मप्रशंसा और अहंकार से भरी बातें सुनकर लक्ष्मण जी अपनी हंसी नहीं रोक पाए और वे व्यंग्यपूर्वक मुस्कुराते हुए मुनि को चिढ़ाने वाले लहजे में बात करने लगे।

अगली 4 लाइन्स:

बहु धनुहीं (अनेक छोटी धनुहियाँ) तोरीं (हम लोगों ने तोड़ी हैं) लरिकाईं (बचपन में)। कबहूँ न (कभी भी आपने) असि रिस (ऐसा क्रोध) कीन्हि गोसाईं (हे स्वामी नहीं किया था)॥ एहि धनु पर (इसी धनुष पर) ममता (इतना विशेष मोह) केहि हेतू (किस कारण से है)। सुनि रिसाइ (यह सुनकर और अधिक गुस्सा होकर) कह भृगुकुलकेतू (भृगुकुल के ध्वजस्वरूप परशुराम जी बोले)॥

भाव: हमने बचपन में खेल-खेल में ऐसी कई छोटी धनुहियाँ तोड़ी हैं, परंतु हे गोसाईं! आपने कभी भी ऐसा क्रोध नहीं किया। फिर इसी धनुष पर आपकी इतनी विशेष ममता और लगाव किस कारण से है? यह सुनकर भृगुकुल के ध्वजस्वरूप परशुराम जी और अधिक क्रोधित होकर बोले।

व्याख्या: लक्ष्मण जी ने परशुराम जी के डर को पूरी तरह खारिज करते हुए व्यंग्य किया कि जब हम छोटे थे, तब हमने धनुर्विद्या सीखते समय खेल-खेल में सैकड़ों साधारण धनुहियाँ तोड़ डाली थीं। उस समय तो आप या किसी अन्य ऋषि ने हमारे ऊपर ऐसा विनाशकारी क्रोध नहीं किया था। फिर इस पुराने और जीर्ण-शीर्ण धनुष से आपका ऐसा क्या अनोखा लगाव या स्वार्थ है कि इसके टूटने पर आप पूरी सृष्टि को नष्ट करने पर तुले हैं? लक्ष्मण का यह तीखा व्यंग्य सुनकर भृगुवंश की कीर्ति बढ़ाने वाले परशुराम जी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।

अंतिम 4 लाइन्स:

रे नृप बालक (हे राजा के पुत्र) काल बस (मृत्यु के वश में होने के कारण) बोलत तोहि न सँभार (तुझे बोलने में कुछ होश नहीं है)। धनुही सम (साधारण धनुही के समान) तिपुरारि धनु (त्रिपुरासुर का वध करने वाले शिवजी का धनुष) बिदित सकल संसार (जिसके बारे में पूरा संसार जानता है)॥

भाव: हे राजा के पुत्र! काल के वश में होने के कारण तुझे मुँह संभालकर बोलने का कोई होश नहीं है। जिसे तू साधारण धनुही कह रहा है, वह साक्षात् भगवान शिव का त्रैलोक्य प्रसिद्ध धनुष है, जिसके वैभव से पूरा संसार परिचित है।

व्याख्या: लक्ष्मण के कटु वचनों से तमतमाए परशुराम जी गरजते हुए बोले कि हे राजा के उद्दंड बालक! तेरी मृत्यु अब तेरे सिर पर मंडरा रही है, इसीलिए काल के प्रभाव में आकर तेरी जीभ बेकाबू हो गई है और तुझे यह भी समझ नहीं आ रहा कि तू किससे और क्या बात कर रहा है। बचपन में तोड़े गए तुच्छ खिलौनों की तुलना तू साक्षात् समर विजयी महादेव के पिनाक धनुष से कर रहा है? यह कोई साधारण खिलौना नहीं, बल्कि समूचे ब्रह्मांड को थर्राने वाला दिव्य शिव धनुष है, जिसका महात्म्य बच्चा-बच्चा जानता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)

प्रश्न 1: परशुराम के क्रोध को देखकर श्रीराम ने स्वयं को क्या बताया?

उत्तर: श्रीराम ने परशुराम जी के क्रोध को शांत करने के लिए बहुत ही विनम्रतापूर्वक स्वयं को उनका एक साधारण ‘दास’ (सेवक) बताया।

व्याख्या: जब शिव-धनुष टूटने पर परशुराम जी सभा में गर्जना कर रहे थे, तब श्रीराम ने अपनी मर्यादा का परिचय दिया। उन्होंने स्थिति को संभालने के लिए कहा कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा, जिससे उनकी विनम्रता प्रकट होती है।

प्रश्न 2: परशुराम ने शिव-धनुष तोड़ने वाले को किसके समान अपना शत्रु माना है?

उत्तर: परशुराम जी ने शिव-धनुष तोड़ने वाले व्यक्ति को ‘सहस्रबाहु’ (हजार भुजाओं वाले राक्षस राजा) के समान अपना परम शत्रु माना है।

व्याख्या: मुनि परशुराम ने सभा में चेतावनी दी थी कि जिसने भी उनके गुरु शिव का धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु की तरह ही मेरा शत्रु है। जैसे मैंने सहस्रबाहु का संहार किया था, वैसे ही उसका भी अंत करूँगा।

प्रश्न 3: लक्ष्मण ने बचपन में तोड़ी गई धनुहियों का उदाहरण क्यों दिया?

उत्तर: लक्ष्मण जी ने परशुराम के क्रोध को कमतर दिखाने और शिव-धनुष को एक साधारण धनुष सिद्ध करने के लिए बचपन की धनुहियों का उदाहरण दिया।

व्याख्या: लक्ष्मण जी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि हमने बचपन में खेल-खेल में ऐसी कई धनुहियाँ तोड़ी थीं, तब तो आपने कभी गुस्सा नहीं किया। वे परशुराम को यह जताना चाहते थे कि इस पुराने धनुष के टूटने पर इतना हंगामा करना व्यर्थ है।

प्रश्न 4: “भृगुकुलकेतू” शब्द कविता में किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

उत्तर: “भृगुकुलकेतू” शब्द भृगु वंश के महान ध्वज या प्रतीक यानी मुनि परशुराम जी के लिए प्रयुक्त हुआ है।

व्याख्या: तुलसीदास जी ने कविता में परशुराम जी के उदात्त और तेजस्वी वंश को रेखांकित करने के लिए इस विशेषण का प्रयोग किया है। इसका अर्थ होता है भृगु श्रेष्ठ या भृगु कुल के कीर्तिमान पुरुष।

प्रश्न 5: परशुराम की धमकियों का सभा में उपस्थित राजाओं पर क्या प्रभाव पड़ रहा था?

उत्तर: परशुराम की भयानक धमकियों और उनके रौद्र रूप को देखकर सभा के सभी राजा डर के मारे थर-थर काँप रहे थे और मौन थे।

व्याख्या: मुनि का भयानक फरसा और उनका क्षत्रिय-विरोधी इतिहास याद करके पूरी सभा में भय का माहौल था। राजा लोग अपने प्राणों की रक्षा के लिए डरकर चुपचाप बैठ गए थे।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

प्रश्न 1: परशुराम के अनुसार एक सच्चे ‘सेवक’ और ‘शत्रु’ में क्या अंतर होता है?

उत्तर: परशुराम जी के अनुसार सेवक वह होता है जो सदैव सेवा का कार्य करे, जबकि शत्रु वह होता है जो नुकसान पहुँचाकर लड़ाई या युद्ध का कारण बने।

व्याख्या: जब श्रीराम ने स्वयं को दास कहा, तब परशुराम ने उग्र होकर जवाब दिया कि सेवक का धर्म भलाई करना है। शिव-धनुष को तोड़कर अपराधी ने शत्रु जैसा काम किया है। ऐसी ‘अरि करनी’ (शत्रुता के कार्य) करने वाले से केवल लड़ाई ही की जा सकती है, उसे सेवक नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 2: लक्ष्मण के तर्क और व्यंग्य वचनों पर परशुराम की क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर: लक्ष्मण के तीखे व्यंग्य और मुस्कुराने से परशुराम का क्रोध शांत होने के बजाय और अधिक भड़क गया तथा वे अपना फरसा संभालकर धमकियाँ देने लगे।

व्याख्या: लक्ष्मण जी मुनि के अहंकार पर लगातार चोट कर रहे थे, जिससे परशुराम जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने लक्ष्मण को ‘काल के वश’ में होने वाला मूर्ख बालक कहा। मुनि ने अपना भयानक कुल्हाड़ा तान लिया और कहा कि इस कड़वा बोलने वाले बालक के वध के लिए अब कोई मुझे दोष न दे।

प्रश्न 3: श्रीराम का शांत स्वभाव इस पूरे विवाद में किस प्रकार सहायक सिद्ध हुआ?

उत्तर: श्रीराम के धैर्य, मानसिक संतुलन और मीठे वचनों ने परशुराम के विनाशकारी क्रोध को शांत करने और पूरी सभा को संकट से बचाने में मुख्य भूमिका निभाई।

व्याख्या: जहाँ एक ओर लक्ष्मण के तर्क और परशुराम का अहंकार आपस में टकरा रहे थे, वहाँ श्रीराम एकदम शांत रहे। उन्होंने विपरीत परिस्थिति में भी अपनी मर्यादा नहीं खोई। उनकी शीतल वाणी ने मुनि के गुस्से की आग में पानी का काम किया, जिससे अंततः विवाद पूरी तरह समाप्त हो गया।

प्रश्न 4: “रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार” पंक्ति के माध्यम से परशुराम क्या चेतावनी दे रहे हैं?

उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से परशुराम लक्ष्मण को चेतावनी दे रहे हैं कि वे मृत्यु के निकट होने के कारण होश खो बैठे हैं और संभलकर नहीं बोल रहे हैं।

व्याख्या: परशुराम जी अत्यधिक क्रोध में आकर लक्ष्मण से कहते हैं कि हे राजा के पुत्र! तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे सिर पर नाच रही है, इसलिए तुम्हें अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं है। तुम अज्ञानतावश भगवान शिव के विश्व प्रसिद्ध धनुष की तुलना खेलकूद की साधारण धनुहियों से करने की भारी भूल कर रहे हो।

प्रश्न 5: तुलसीदास ने इस प्रसंग में राम और लक्ष्मण के चरित्र में क्या मुख्य अंतर दिखाया है?

उत्तर: तुलसीदास जी ने श्रीराम को विनम्रता, संयम और शांति का प्रतीक दिखाया है, जबकि लक्ष्मण को निडरता, उग्रता और तार्किक वीर के रूप में प्रस्तुत किया है।

व्याख्या: इस संवाद में दोनों भाइयों का चरित्र एक-दूसरे के विपरीत है। श्रीराम जहाँ बड़ों का आदर करते हुए विवाद को टालना चाहते हैं और बहुत कम तथा मधुर बोलते हैं; वहीं लक्ष्मण क्षत्रिय धर्म के स्वाभिमान के साथ अन्याय और अनुचित क्रोध का डटकर मुकाबला करते हैं। वे अपनी हाजिरजवाबी और व्यंग्य से परशुराम के घमंड को चुनौती देते हैं।