NCERT समाधान कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 3 (तृतीयः पाठः) “आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः” के प्रश्न-उत्तर, हिन्दी अनुवाद, शब्दार्थ, भावार्थ, सारांश, व्याकरण अभ्यास तथा अतिरिक्त प्रश्न-उत्तर यहाँ सरल एवं विद्यार्थियों की समझ के अनुसार प्रस्तुत किए गए हैं। यह पाठ महाराष्ट्र के महान संत महात्मा नामदेव महाराज के जीवन से प्रेरित एक शिक्षाप्रद प्रसंग पर आधारित है, जिसमें सभी प्राणियों में ईश्वर का वास, जीव-दया, करुणा, अहिंसा और समानता का संदेश दिया गया है। पाठ यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव में निवास करते हैं। इसलिए सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, दया और सम्मान का भाव रखना ही सच्चे ज्ञान और श्रेष्ठ आचरण का प्रतीक है।
पाठ-परिचय (Chapter Introduction)
“आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः” यह पाठ हमें सभी प्राणियों के प्रति समानता, करुणा और ‘भूतदया’ (जीवों पर दया) की महान शिक्षा देता है। इस पाठ में नानी (मातामही) के माध्यम से बच्चों को महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत महात्मा नामदेव महाराज के जीवन की एक अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक घटना सुनाई गई है। पाठ हमें यह सिखाता है कि ईश्वर केवल मंदिरों की मूर्तियों में ही नहीं, बल्कि संसार के हर छोटे-बड़े जीव के भीतर निवास करते हैं। जो व्यक्ति दूसरों के कष्ट को अपना कष्ट समझता है और हर प्राणी को अपने समान देखता है, वही वास्तव में सच्चा विद्वान या पंडित है। यह अध्याय बच्चों में नैतिक मूल्यों, दयाभाव और अहिंसा का विकास करने के उद्देश्य से लिखा गया है।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
(अर्थात्: जो व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने समान देखता है, वही सच्चा विद्वान या पंडित है।)
| आत्मवत् – अपने समान / खुद की तरह | यः पश्यति – जो देखता है |
| सर्वभूतेषु – सभी प्राणियों में / सभी जीवों में | सः पण्डितः – वही विद्वान है / वही सच्चा ज्ञानी है |
भारतदेशः बहूनां ब्रह्मर्षीणां महात्मनां च भूमिः। तेषां चरित्राणि सकलस्य विश्वस्य कृते प्रेरणास्पदम्। तेषां चरित्रेषु प्रतिपदं भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, ऋजुता, बन्धुता चेत्यादीनि जीवनमूल्यानि प्राप्यन्ते।
सरल भाव: भारत देश बहुत से ब्रह्मर्षियों और महात्माओं की भूमि है। उनके चरित्र संपूर्ण विश्व के लिए प्रेरणास्पद (प्रेरणा देने वाले) हैं। उनके चरित्रों में कदम-कदम पर भूतदया (प्राणियों पर दया), समानता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, सरलता और बंधुत्व (भाईचारा) आदि जीवन मूल्य मिलते हैं।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| बहुनाम् – बहुत से | प्रतिपदम् – कदम-कदम पर / हर मोड़ पर |
| तेषाम् – उनके | भूतदया – जीवों पर दया |
| चरित्राणि – चरित्र / जीवन गाथाएँ | ऋजुता – सरलता / सीधापन |
| सकलस्य – संपूर्ण / पूरे | बन्धुता – भाईचारा / बंधुत्व |
| कृते – के लिए | चेत्यादीनि – च + आदि (और आदि / इत्यादि) |
| प्रेरणास्पदम् – प्रेरणा का स्रोत / प्रेरणादायक | प्राप्यन्ते – प्राप्त होते हैं / मिलते हैं |
महाराष्ट्रस्य प्रसिद्धः महात्मा नामदेवमहाराजः स्वीयव्यवहारेण करुणायाः महान्तम् आदर्शम् उपस्थापितवान्। सः सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य न केवलं सङ्कीर्तनं कृतवान् अपि तु सर्वेषु जीवेषु सः भगवन्तं दृष्टवान्। नामदेवमहाराजस्य जीवनस्य काचित् शिक्षाप्रदा घटना अत्र प्रदर्शिता अस्ति यां पठित्वा अस्माकं जीवनं परिवर्तितं भवेत्।
सरल भाव: महाराष्ट्र के प्रसिद्ध महात्मा नामदेव महाराज ने अपने व्यवहार से करुणा का एक महान आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने सर्वव्यापी ईश्वर का न केवल कीर्तन (भजन) किया, बल्कि सभी जीवों में उस भगवान को देखा। नामदेव महाराज के जीवन की एक शिक्षाप्रद घटना यहाँ दिखाई गई है, जिसे पढ़कर हमारा जीवन बदल सकता है।)
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| स्वीयव्यवहारेण – अपने व्यवहार से | दृष्टवान् – देखा |
| उपस्थापितवान् – प्रस्तुत किया / सामने रखा | काचित् – कोई / एक |
| सर्वात्मकस्य – सर्वव्यापी / जो सब में व्याप्त है | पठित्वा – पढ़कर |
| सङ्कीर्तनम् – भजन-कीर्तन / गुणगान | भवेत् – हो सकता है / होना चाहिए |
| जीवेषु – जीवों में / प्राणियों में |
कपिलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ। तत्र क्रीडावेलायां कञ्चन शुनकं दृष्टवन्तौ। तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं हस्ते स्वीकृत्य तं मारयितुं धावितवन्तौ ।
सरल भाव: कपिल और माधवी छुट्टियों के समय अपने मामा के घर गए। वहाँ खेल के समय उन्होंने एक कुत्ते को देखा। उसे देखकर, हाथ में पत्थर का टुकड़ा लेकर वे उसे मारने के लिए दौड़े।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| अवकाशकाले – छुट्टियों के समय | तम् – उसे |
| मातुलगृहम् – मामा के घर | दृष्ट्वा – देखकर |
| गतवन्तौ – गए (दोनों के लिए) | पाषाणखण्डम् – पत्थर का टुकड़ा |
| तत्र – वहाँ | हस्ते – हाथ में |
| क्रीडावेलायाम् – खेल के समय | स्वीकृत्य – लेकर / उठाकर |
| कञ्चन – किसी / एक | मारयितुम् – मारने के लिए |
| शुनकम् – कुत्ते को | धावितवन्तौ – दौड़े (दोनों) |
| दृष्टवन्तौ – देखा (दोनों ने) |
शुनकः भयेन आक्रोशं कुर्वन् वेगेन धावितवान्। तत् दृष्ट्वा कपिलः माधवी च उच्चैः हसितवन्तौ। मातामही तं प्रसङ्ग दूरात् दृष्टवती, तौ आहूतवती च।
सरल भाव: कुत्ता डर के मारे चिल्लाता (भौंकता) हुआ तेजी से भागा। यह देखकर कपिल और माधवी जोर-जोर से हंसने लगे। नानी ने इस घटना को दूर से देखा और उन दोनों को बुलाया।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| भयेन – डर से / भय के कारण | हसितवन्तौ – हँसे |
| आक्रोशम् – चिल्लाना / रोना-चीखना | मातामही – नानी (माँ की माँ) |
| कुर्वन् – करता हुआ | प्रसङ्गम् – घटना को / दृश्य को |
| वेगेन – तेजी से / तेज रफ्तार से | दूरात् – दूर से |
| धावितवान् – भागा | दृष्टवती – देखा (स्त्रीलिंग के लिए) |
| तत् – वह / यह | तौ – उन दोनों को |
| उच्चैः – जोर-जोर से / ऊँची आवाज में | आहूतवती – बुलाया (स्त्रीलिंग के लिए) |
मातामही – भोः कपिल ! माधवि ! किं कुरुतः ?
कपिलः – मातामहि ! पश्यतु किल । सः शुनकः आवयोः क्रीडायां मध्ये मध्ये प्रविश्य आवां पीडयति स्म। अतः आवां तं सम्यक् दण्डितवन्तौ। (पुनः उच्चैः हसितवन्तौ)
सरल भाव: (मातामही – अरे कपिल! माधवी! क्या कर रहे हो?)
(कपिल – नानी! देखिए तो सही। वह कुत्ता हमारे खेल के बीच-बीच में आकर हमें परेशान कर रहा था। इसलिए हम दोनों ने उसे अच्छी तरह सजा दी। (दोनों फिर से जोर से हँसे))
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| भोः – अरे / ओ | आवाम् – हम दोनों को |
| किं कुरुतः – क्या कर रहे हो? (तुम दोनों के लिए) | पीडयति स्म – परेशान कर रहा था / सता रहा था |
| पश्यतु किल – देखिए तो सही / जरा देखिए | तम् – उसे |
| आवयोः – हमारे / हम दोनों के | सम्यक् – अच्छी तरह से / ठीक से |
| प्रविश्य – प्रवेश करके / आकर | दण्डितवन्तौ – सजा दी / दंडित किया (दोनों ने) |
मातामही – वत्सौ, अधुना क्रीडया अलम्। कथां श्रोतुम् इच्छतः वा?
उभावपि – मातामह्याः कथा ! रोचते मे कथा … रोचते मे मातामही। (मातामहीम् आलिङ्गितवन्तौ)
सरल भाव: (मातामही – बच्चों, अब खेल बंद करो (खेलना बस करो)। कहानी सुनना चाहते हो क्या?)
(दोनों ही – नानी की कहानी! मुझे कहानी अच्छी लगती है… मुझे नानी अच्छी लगती हैं। (दोनों ने नानी को गले लगा लिया))
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| वत्सौ – बच्चों! / प्यारे बच्चों! (दो बच्चों) | इच्छतः वा – चाहते हो क्या? (दोनों के लिए) |
| अधुना – अब / इस समय | उभावपि – दोनों ही (उभौ + अपि) |
| क्रीडया अलम् – खेलना बस/बंद करो | रोचते मे – मुझे अच्छी लगती है |
| कथाम् – कहानी को | आलिङ्गितवन्तौ – गले लगा लिया (दोनों ने) |
| श्रोतुम् – सुनने के लिए / सुनना |
मातामही – उपविशताम्, सावधानेन शृणुतां च। अस्माकं भारतभूमिः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मर्षीणां राजर्षीणां च प्रसवित्री। बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः । किं भवन्तौ महात्मानं नामदेवं जानीतः ?
माधवी – आम्। अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान् इति। अपि सत्यम् ?
सरल भाव: मातामही – बैठ जाओ और ध्यान से सुनो। हमारी भारतभूमि अनेक नर-रत्नों, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों को जन्म देने वाली (माता) है। बहुत से सत्पुरुषों ने अपने कार्यों (कर्तृत्व) से अपना जन्म सार्थक किया है। क्या तुम दोनों महात्मा नामदेव को जानते हो?
(माधवी – हाँ। मैंने सुना है कि उनके कीर्तन में स्वयं भगवान पांडुरंग (विट्ठल) ने नृत्य किया था। क्या यह सच है?)
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| उपविशताम् – बैठ जाओ (तुम दोनों के लिए आज्ञा) | कृतवन्तः – किया है (बहुवचन के लिए) |
| सावधानेन – सावधानी पूर्वक | भवन्तौ – आप दोनों (कपिल+माधवी) |
| शृणुताम् – सुनो (दोनों के लिए) | जानीतः – जानते हो (तुम दोनों) |
| अस्माकम् – हमारी / हमारा | आम् – हाँ |
| नररत्नानाम् – मनुष्यों में रत्नों/महान | श्रुतवती – सुना है (स्त्रीलिंग) |
| राजर्षीणाम् – राजर्षियों का (राजा जो ऋषि समान हों) | यत् – कि |
| प्रसवित्री – जन्म देने वाली / माता | तस्य – उनके |
| बहवः – बहुत से | कीर्तने – भजन-कीर्तन में |
| सत्पुरुषाः – सज्जन पुरुष / संत लोग | कृतवान् – किया था |
| स्वीयकर्तृत्वेन – स्वयं के कार्यक्षमता द्वारा | अपि सत्यम् – क्या यह सच है? |
मातामही – आम्। तस्यैव पुण्यश्लोकस्य पाण्डुरङ्गमित्रस्य नामदेवमहाराजस्य एषा कथा । नामदेव: न केवलं पाण्डुरङ्गस्य प्रियभक्तः अपि तु प्रियमित्रमपि। देवः नामदेवं परितः भवति स्म ।
माधवी – किं सत्यमेव नामदेवस्य मित्रम् आसीत् पाण्डुरङ्गः ?
सरल भाव: मातामही – हाँ। उन्हीं पुण्यश्लोक (पवित्र कीर्ति वाले) पांडुरंग के मित्र नामदेव महाराज की यह कहानी है। नामदेव न केवल पांडुरंग के प्रिय भक्त थे, बल्कि प्रिय मित्र भी थे। भगवान हमेशा नामदेव के आसपास ही रहते थे।
माधवी – क्या सचमुच पांडुरंग नामदेव के मित्र थे?
| तस्यैव – उन्हीं के (तस्य + एव) | प्रियमित्रमपि – प्रिय मित्र भी (प्रियमित्रम् + अपि) |
| पुण्यश्लोकस्य – पवित्र कीर्ति वाले / महान यशस्वी | परितः – चारों ओर / आसपास |
| पाण्डुरङ्गमित्रस्य – पांडुरंग के मित्र का | भवति स्म – रहते थे / होते थे |
| एषा – यह (स्त्रीलिंग के लिए) |
कपिलः – किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति ?
मातामही – आम् वत्सौ । देवः पाण्डुरङ्गः नामदेवस्य प्रियसुहृदासीत् । नामदेवः प्रतिदिनं पाण्डुरङ्गाय नैवेद्यं समर्प्य, तं भोजयित्वा ततः परमेव अन्नं सेवते स्म । तस्य गुरुः आसीत् विसोबा । विसोबा तम् अध्यापितवान्
सरल भाव: कपिल – क्या भगवान के साथ भी मित्रता होना संभव है?
सरल भाव: मातामही – हाँ बच्चों! भगवान पांडुरंग नामदेव के प्रिय मित्र (सच्चे मित्र) थे। नामदेव हर रोज पांडुरंग को नैवेद्य (भोग) अर्पित करके, उन्हें भोजन कराकर, उसके बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करते थे। उनके गुरु विसोबा थे। विसोबा ने उन्हें ज्ञान दिया था (सिखाया था)।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| देवेन सह – भगवान के साथ | तं भोजयित्वा – उन्हें भोजन कराकर |
| प्रियसुहृदासीत् – प्रिय मित्र थे (प्रियसुहृद् + आसीत्) | ततः परमेव – उसके बाद ही (ततः + परम् + एव) |
| नैवेद्यम् – भोग / प्रसाद | अन्नं सेवते स्म – अन्न ग्रहण करते थे |
| समर्प्य – अर्पित करके / चढ़ाकर | तम् अध्यापितवान् – उन्हें पढ़ाया / उन्हें ज्ञान दिया |
यत् ‘ईश्वरः न केवलं मन्दिरे भवति, अपि तु सर्वेषु भूतेषु तस्य निवासो भवति। अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु’ इति।
कपिलः – मातामहि ! किं सत्यमेव ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति ?
मातामही – आम्, शृणु वत्स ! नामदेवः प्रतिदिनम् अतीवश्रद्धया निष्ठया भक्त्या च नैवेद्यस्थालिकाम् आदाय मन्दिरं गच्छति स्म । एकदा सः नैवेद्यस्थालिकां गृहीत्वा विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान् । नेत्रे निमील्य प्रार्थनां कृतवान् –
सरल भाव: कि ‘ईश्वर न केवल मंदिर में होते हैं, बल्कि सभी प्राणियों (जीवों) में उनका निवास होता है। इसलिए उस सर्वव्यापी ईश्वर का पूजन करो’ ऐसा।
कपिल – नानी! क्या सचमुच ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करते हैं?
मातामही – हाँ, सुनो बच्चे! नामदेव हर रोज अत्यंत श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति के साथ नैवेद्य (भोग) की थाली लेकर मंदिर जाते थे। एक बार वह भोग की थाली लेकर मूर्ति के सामने रख दिए। आँखें बंद करके उन्होंने प्रार्थना की —
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| यत् – कि | अतीवश्रद्धया – अत्यधिक श्रद्धा से |
| सर्वेषु भूतेषु – सभी प्राणियों में | भक्त्या च – और भक्ति से |
| निवासो भवति – निवास होता है | नैवेद्यस्थालिकाम् – भोग की थाली को |
| सर्वात्मकस्य – जो सब में व्याप्त है | आदाय – लेकर |
| इति – ऐसा / इस प्रकार | मन्दिरं गच्छति स्म – मंदिर जाते थे |
| किं सत्यमेव – क्या सचमुच ही | गृहीत्वा – लेकर / पकड़कर |
| निवसति – निवास करते हैं | विग्रहस्य पुरतः – मूर्ति के सामने |
| शृणु वत्स – सुनो बच्चे! / सुनो बेटा! | निमील्य – बंद करके |
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्॥
सरल भाव: हे भगवान! इस नैवेद्य (भोग) को ग्रहण कीजिए और मेरी भक्ति को निश्चल (अटल) कर दीजिए। मुझे मेरी इच्छानुसार वरदान दीजिए और परलोक में परम गति (मोक्ष) प्रदान कीजिए।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| गृह्यताम् – ग्रहण कीजिए | ईप्सितम् – इच्छित |
| देव – हे भगवान! / हे देव! | मे वरम् – मुझे वरदान |
| भक्तिं मे – मेरी भक्ति को | देहि – दीजिए |
| ह्यचलाम् – अटल / स्थिर (ही + अचलाम्) | परत्र च – और परलोक में |
| कुरु – कीजिए / करो | परां गतिम् – मोक्ष / परम गति को |
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
सरल भाव: शक्कर के टुकड़ों (मिश्री) से बने पकवान, दही, दूध और घी से युक्त इस भोजन तथा खाने योग्य खाद्य पदार्थों के इस नैवेद्य (भोग) को स्वीकार कीजिए।)
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| शर्कराखण्डखाद्यानि – चीनी/मिश्री से बने पकवान | भक्ष्यभोज्यं च – खाने योग्य भोज्य पदार्थ और |
| दधिक्षीरघृतानि – दही, दूध और घी | प्रतिगृह्यताम् – स्वीकार/ग्रहण किया जाए |
| आहारम् – भोजन को |
मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य सः नेत्रे उद्घाटितवान्।
अहो आश्चर्यम् ! पुरतः स्थितायां स्थालिकायां रोटिका नासीत् ।
सरल भाव: मंत्र का उच्चारण करके, श्रद्धा से प्रणाम करके उन्होंने आँखें खोलीं। अरे आश्चर्य! सामने रखी हुई थाली में रोटी नहीं थी।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| मन्त्रम् उच्चार्य – मंत्र का उच्चारण करके | अहो आश्चर्यम् – अरे! बड़े आश्चर्य की बात है |
| श्रद्धया – श्रद्धा पूर्वक | पुरतः – सामने |
| प्रणम्य – प्रणाम करके | स्थितायाम् – रखी हुई / स्थित |
| सः – उन्होंने / उसने | स्थालिकायाम् – थाली में |
| नेत्रे उद्घाटितवान् – आँखें खोलीं | रोतिका नासीत् – रोटी नहीं थी |
माधवी – पाण्डुरङ्गः आगत्य भक्षितवान् किल ?
मातामही – न हि। कश्चन बुभुक्षितः शुनकः आगत्य रोटिकां मुखे गृहीत्वा धावितवान्।
कपिल: – धिक् शुनकम् ! मातामहि ! पश्तु , शुनकाः दुष्टाः एव भवन्ति।
सरल भाव: माधवी – पांडुरंग ने आकर (रोटी) खा ली न?
मातामही – नहीं। कोई भूखा कुत्ता आया और रोटी मुँह में दबाकर भाग गया।
कपिल – धिक्कार है उस कुत्ते को! नानी! देखिए, कुत्ते दुष्ट ही होते हैं।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| आगत्य – आकर | रोटिकाम् – रोटी को |
| भक्षितवान् किल – खा ली न? / खा लिया क्या? | गृहीत्वा – लेकर / दबाकर |
| न हि – नहीं / ऐसा नहीं है | धावितवान् – भागा / दौड़ गया |
| कश्चन – कोई / किसी | धिक् शुनकम् – कुत्ते को धिक्कार है |
| बुभुक्षितः – भूखा | पश्यतु – देखिए |
| शुनकः – कुत्ता | दुष्टाः एव भवन्ति – दुष्ट ही होते हैं |
माधवी – सत्यं भ्रातः ! नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु ।
मातामही – पुत्रकौ, शृणुताम्। नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान् । जानीतः किमर्थं कथं च ?
सरल भाव: माधवी – सच है भाई! नामदेव को कितना दुःख हुआ होगा ना।
मातामही – प्यारे बच्चों, सुनो। नामदेव उस कुत्ते के पीछे-पीछे दौड़े। जानते हो किसलिए और कैसे?
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| सत्यं भ्रातः – सच है भाई! | शृणुताम् – सुनो (तुम दोनों के लिए) |
| कियत् दुःखम् – कितना दुःख | अनुधावितवान् – पीछे-पीछे दौड़े |
| जातं स्यात् खलु – हुआ होगा निश्चित ही | जानीतः – जानते हो? |
| पुत्रकौ – प्यारे बच्चों! | किमर्थं कथं च – किसलिए और कैसे? |
कपिलः – क्रोधेन लगुडम् आदाय शुनकं ताडयितुं धावितवान् स्यात् !
माधवी – दण्डयितुं पाषाणखण्डम् आदाय धावितवान् स्यात् ! सत्यं किल मातामहि !
मातामही – न हि बालौ ! नामदेवः कोपेन न धावितवान्, प्रत्युत सः करुणया धावितवान्। न लगुडं, न पाषाणखण्डम्, अपि तु घृतपात्रं धृत्वा।
सरल भाव: कपिल – गुस्से में डंडा लेकर कुत्ते को पीटने के लिए पीछे दौड़े होंगे!
माधवी – सजा देने के लिए पत्थर का टुकड़ा लेकर दौड़े होंगे! सच है ना नानी?
मातामही – ऐसा नहीं है बच्चों! नामदेव गुस्से से नहीं दौड़े थे, बल्कि वह तो करुणा (दया) के कारण दौड़े थे। न डंडा, न पत्थर का टुकड़ा, बल्कि (हाथ में) घी का पात्र (कटोरा) लेकर।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| क्रोधेन – गुस्से से / क्रोध के कारण | सत्यं किल – सच है ना? |
| लगुडम् – डंडा / लाठी | बालौ – बच्चों! |
| आदाय – लेकर | कोपेन – गुस्से से / कोप के कारण |
| ताडयितुम् – पीटने के लिए / मारने के लिए | न धावितवान् – नहीं दौड़े थे |
| धावितवान् स्यात् – दौड़े होंगे | प्रत्युत – बल्कि / इसके विपरीत |
| दण्डयितुम् – सजा देने के लिए / दंड देने के लिए | करुणया – करुणा से / दया के भाव से |
| पाषाणखण्डम् – पत्थर का टुकड़ा | धृत्वा – लेकर / धारण करके |
उभावपि – (साश्चर्यम् उच्चैः) किं घृतपात्रम् आधृत्य ?
मातामही – आम्, घृतपात्रम् आधृत्य एव ।
उभौ – किन्तु किमर्थम् ?
सरल भाव: दोनों ही – (आश्चर्य के साथ जोर से) क्या घी का कटोरा लेकर?
मातामही – हाँ, घी का कटोरा लेकर ही।
दोनों – लेकिन किसलिए?
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| उभावपि – दोनों ही | आधृत्य – लेकर / थामकर |
| साश्चर्यम् – आश्चर्य के साथ | किन्तु – लेकिन |
| उच्चैः – जोर से / ऊँची आवाज में | किमर्थम् – किसलिए / क्यों? |
मातामही – जातौ, शुनकः शुष्करोटिकां अपहृत्य पलायितवान् खलु। महात्मनः नामदेवस्य चिन्ता आसीत् यत् यदि शुनकः शुष्करोटिकां खादेत् तर्हि तस्य उदरवेदना भवेत् इति।
अतः तस्य पीडा मा भवतु इति चिन्तयन् घृतपात्रम् आदाय ‘हे देव! शुष्कां रोटिकां मा खादतु, घृतम् अपि स्वीकरोतु’ इति वदन् अनुधावितवान् सः ।
(उभौ परस्परं पश्यतः । अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम् ।)
सरल भाव: मातामही – बच्चों, कुत्ता सूखी रोटी छीनकर भाग गया था न। महात्मा नामदेव की चिंता यह थी कि यदि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा तो उसके पेट में दर्द हो जाएगा। इसलिए उसे कष्ट (पीड़ा) न हो, ऐसा सोचते हुए वे घी का कटोरा लेकर ‘हे भगवान! सूखी रोटी मत खाइए, घी भी स्वीकार कीजिए’ ऐसा कहते हुए उसके पीछे दौड़े।)
दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। अपराधबोध की भावना (गलती के अहसास) से उन दोनों के चेहरे उतर गए (उदास हो गए।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| जातौ – बच्चों! / प्यारे बच्चों! | घृतपात्रम् आदाय – घी का कटोरा लेकर |
| शुष्करोटिकाम् – सूखी रोटी को | मा खादतु – मत खाइए |
| अपहृत्य – छीनकर / चुराकर | घृतम् अपि – घी भी |
| पलायितवान् खलु – भाग गया था न | इति वदन् – ऐसा बोलते हुए |
| तर्हि – तो | अनुधावितवान् सः – वे पीछे-पीछे दौड़े |
| तस्य उदरवेदना – उसके पेट में दर्द | उभौ – दोनों |
| भवेत् इति – हो जाएगा / हो सकता है ऐसा | परस्परं पश्यतः – एक-दूसरे को देखते हैं |
| तस्य पीडा – उसे कष्ट / उसकी तकलीफ | अपराधभावनया – गलती के अहसास से |
| मा भवतु – न हो | तयोः मुखे – उन दोनों के चेहरे |
| इति चिन्तयन् – ऐसा सोचते हुए | म्लाने आस्ताम् – मुरझा गए / उदास हो गए |
मातामही – धावन् शुनकः अदृश्यः जातः । तस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतः।
स नामदेवम् उक्तवान् – ‘वत्स नामदेव ! उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्। ‘ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति’ इति गुरूपदेशं न केवलं भवान् श्रुतवान् अपि तु अनुपालितवान्। सुतरां धन्यो भवान्।
सरल भाव: मातामही – दौड़ता हुआ कुत्ता अदृश्य (गायब) हो गया। उसके स्थान पर पांडुरंग प्रकट हो गए। उन्होंने नामदेव से कहा – ‘बेटा नामदेव! आप परीक्षा में उत्तीर्ण (पास) हो गए। ‘ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करते हैं’ इस गुरु के उपदेश को आपने न केवल सुना बल्कि उसका पालन भी किया। आप वास्तव में धन्य हैं।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| धावन् – दौड़ता हुआ | उत्तीर्णः भवान् – आप उत्तीर्ण हो गए |
| अदृश्यः जातः – अदृश्य हो गया / गायब हो गया | गुरूपदेशम् – गुरु के उपदेश को |
| तस्य स्थाने – उसके स्थान पर / उसकी जगह | अनुपालितवान् – पालन किया |
| आविर्भूतः – प्रकट हुए / सामने आए | सुतराम् – वास्तव में / अत्यंत |
| उक्तवान् – कहा / बोले | धन्यो भवान् – आप धन्य हैं |
कपिलः – मातामहि ! अहं प्रमादं कृतवान्। अकारणं हि शुनकं ताडितवान्। इतः पूर्वमपि बहुवारं जीवान् पीडितवान्। अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु जीवेषु ईश्वरः निवसति, अतः कमपि न पीडयिष्यामि इति।
माधवी – मातामहि ! क्षाम्यतु माम्। अहमपि कदापि कस्यापि पीडां न जनयिष्यामि।
सरल भाव: कपिल – नानी! मैंने बहुत बड़ी भूल (गलती) की। मैंने बिना किसी कारण के ही कुत्ते को मारा। इससे पहले भी मैंने कई बार जीवों को परेशान किया है। आज मैंने जान लिया है कि सभी जीवों में ईश्वर निवास करते हैं, इसलिए अब मैं कभी किसी को परेशान नहीं करूँगा।
माधवी – नानी! मुझे क्षमा कीजिए। मैं भी कभी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाऊँगी।
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| प्रमादम् – भूल / बड़ी गलती | ज्ञातवान् – जान लिया |
| कृतवान् – की / किया | कमपि न – किसी को भी नहीं |
| अकारणम् – बिना किसी कारण के / बेवजह | पीडयिष्यामि – पीड़ा नहीं दूंगा |
| ताडितवान् – मारा / पीटा | क्षाम्यतु माम् – मुझे क्षमा कीजिए |
| इतः पूर्वमपि – इससे पहले भी | अहम् अपि – मैं भी |
| बहुवारम् – बहुत बार | कस्यापि – किसी को भी |
| जीवान् पीडितवान् – जीवों को परेशान किया | पीडां न जनयिष्यामि – कष्ट नहीं पहुँचाऊँगी |
मातामही – चिरञ्जीविनौ ! मां निकषा आगच्छताम्। (आलिङ्गनं कृत्वा) अस्माकं कायेन वाचा मनसा वा कस्यापि पीडा न भवेत्। तथैव कस्यापि या कापि पीडा स्यात् तां निवारयितुं प्रयतामहे इति सङ्कल्पं कुर्मः । इदमस्तु अस्माकं ध्येयम् –
‘आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।’
सरल भाव: मातामही – दीर्घायु होओ (लंबी उम्र वाले बनो)! मेरे पास आओ। (गले लगाकर) हमारे शरीर, वाणी या मन से किसी को भी कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। वैसे ही किसी को भी जो कोई भी कष्ट हो, उसे दूर करने का हम प्रयास करें—ऐसा संकल्प करते हैं। यही हमारा ध्येय (लक्ष्य) होना चाहिए —
जो व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने समान देखता है, वही सच्चा विद्वान या पंडित है
शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning):
| चिरञ्जीविनौ – दीर्घायु होओ | पीडा स्यात् – कष्ट हो / तकलीफ हो |
| माम् – मेरे | ताम् – उसे |
| निकषा – पास / निकट | निवारयितुम् – दूर करने के लिए |
| आगच्छताम् – आओ | प्रयतामहे – हम प्रयास करें |
| आलिङ्गनं कृत्वा – गले लगाकर | इति सङ्कल्पं कुर्मः – ऐसा संकल्प करते हैं |
| अस्माकम् – हमारे / हमारे द्वारा | इदमस्तु – यह होना चाहिए |
| कायेन – शरीर से / कर्म से | ध्येयम् – लक्ष्य |
| मनसा वा – या मन से | आत्मवत् – अपने जैसा |
| कस्यापि – किसी को भी | सर्वभूतेषु – सभी जीवों में |
| पीडा न भवेत् – कष्ट नहीं होना चाहिए | यः पश्यति – जो देखता है |
| तथैव – वैसे ही / उसी प्रकार (तथा + एव) | सः पण्डितः – वही सच्चा ज्ञानी है |
| या कापि – जो कोई भी |
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः (Page – 30)
१. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत –
(क) मातामही कस्य कथां श्रावितवती? (नानी ने किसकी कहानी सुनाई थी?)
उत्तरम्: मातामही नामदेवमहाराजस्य कथां श्रावितवती।
(नानी ने नामदेव महाराज की कहानी सुनाई थी।)
(ख) नामदेवस्य गुरुः नामदेवं किम् अध्यापितवान्? (नामदेव के गुरु ने नामदेव को क्या सिखाया/पढ़ाया था?)
उत्तर: नामदेवस्य गुरुः नामदेवं ‘आत्मवत्सर्वभूतेषु’ इति अध्यापितवान्।
(नामदेव के गुरु ने नामदेव को ‘सभी जीवों को अपने समान देखना’ यह सिखाया था।)
(ग) नामदेवः कया भावनया धावनं कृतवान्? (नामदेव किस भावना से (कुत्ते के पीछे) दौड़े थे?)
उत्तर: नामदेवः शुनके साक्षात् भगवतः पाण्डुरङ्गस्य दर्शनं कृत्वा ‘अयं मम आराध्यदेवः एव अस्ति, स च क्षुधितः अस्ति’ इति भगवद्भावनया धावनं कृतवान्।
(नामदेव ने कुत्ते में साक्षात भगवान पांडुरंग के दर्शन करके ‘यह मेरे आराध्य देव ही हैं और वे भूखे हैं’ इस विशुद्ध भगवद्भावना (ईश्वर-भाव) से उसके पीछे दौड़ लगाई थी।)
(घ) बालकयोः मुखे किमर्थं म्लाने संजाते?
(दोनों बालकों (कपिल और माधवी) के चेहरे किसलिए उतर गए/फीके पड़ गए?)
उत्तर: यदा मातामही बालकयोः जीव-हिंसायाः प्रवृत्तौ सन्त-नामदेवस्य शुनक-प्रसङ्गं श्रावितवती, तदा स्वस्याः अज्ञानतायाः कारणात् लज्जावशात् च बालकयोः मुखे म्लाने संजाते।
(जब नानी ने बालकों की जीव-हिंसा (कुत्ते को पत्थर मारने) की आदत पर संत नामदेव और कुत्ते वाला प्रेरक प्रसंग सुनाया, तब अपनी अज्ञानता का अहसास होने और शर्म के कारण दोनों बालकों के चेहरे उतर गए।)
(ङ) कपिलः माधवी च कं सङ्कल्पं कृतवन्तौ? (कपिल और माधवी ने क्या संकल्प लिया?)
उत्तर: नामदेवमहाराजस्य कथां श्रुत्वा प्रभावितौ भूत्वा कपिलः माधवी च ‘अद्यारभ्य आवां कदापि प्राणिनां हिंसां न करिष्यावः, प्राणिमात्रं प्रति च दयाभावं धरिष्यावः’ इति सङ्कल्पं कृतवन्तौ।
(संत नामदेव महाराज की कहानी से प्रभावित होकर कपिल और माधवी ने संकल्प लिया कि ‘आज से हम दोनों कभी भी प्राणियों की हिंसा (उन्हें चोट) नहीं करेंगे और हर जीव के प्रति मन में दया का भाव रखेंगे।’)
(च) तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं स्वीकृत्य मारयितुं धावितवन्तौ इति वाक्ये ‘तम्’ इति सर्वनामशब्दः कस्य कृते प्रयुक्तः?
(उसे देखकर पत्थर का टुकड़ा लेकर मारने के लिए दौड़े” इस वाक्य में ‘तम्’ (उसे) सर्वनाम शब्द किसके लिए इस्तेमाल हुआ है?)
उत्तर: अस्मिन् वाक्ये ‘तम्’ इति सर्वनामशब्दः गृहस्य प्राङ्गणस्य समीपे उपविष्टस्य तस्य बुभुक्षितस्य शुनकस्य (कुक्कुरस्य) कृते प्रयुक्तः अस्ति।
इस वाक्य में ‘तम्’ सर्वनाम शब्द घर के आँगन के पास बैठे हुए उस भूखे कुत्ते के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिसे बच्चे मारने दौड़े थे।
(छ) कपिलः माधवी च कुत्र गतवन्तौ? (कपिल और माधवी कहाँ गए थे?)
उत्तर: कपिलः माधवी च ग्रीष्मावकाशे (या सुट्ट्यासु) विहारार्थं ज्ञानार्जनाय च स्वस्य मातामह्याः गृहं गतवन्तौ।
कपिल और माधवी गर्मियों की छुट्टियों में घूमने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपनी नानी के घर गए थे।
(ज) ‘मातामही तं प्रसङ्ग दृष्टवती, तौ आहूतवती च’। इति वाक्ये ‘तौ’ इति शब्दः कस्यां विभक्तौ अस्ति?
(नानी ने उस घटना को देखा और उन दोनों को बुलाया।” इस वाक्य में ‘तौ’ (उन दोनों को) शब्द किस विभक्ति में है?)
उत्तर: इति वाक्ये ‘तौ’ इति शब्दः ‘तत्’ सर्वनामपदस्य पुल्लिङ्गे द्वितीया विभक्तौ द्विवचने अस्ति, यः कपिल-माधव्योः कृते प्रयुक्तः।
(इस वाक्य में ‘तौ’ शब्द ‘तत्’ सर्वनाम के पुल्लिङ्ग रूप में द्वितीया विभक्ति के द्विवचन में है, जो यहाँ कपिल और माधवी (उन दोनों) के लिए इस्तेमाल हुआ है।)
२. अधोलिखितानि वाक्यानि भूतकालेन परिवर्त्य पुनः लिखत – (Page – 31)
यथा – नामदेवः स्थालिकां स्वीकृत्य मन्दिरं गच्छति।
नामदेवः स्थालिकां स्वीकृत्य मन्दिरं गतवान्।
(क) नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापयति । (वह मूर्ति के सामने भोग (प्रसाद) रखता है।)
उत्तर: नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। (उसने मूर्ति के सामने भोग (प्रसाद) रखा।)
(ख) नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं करोति। (वह आँखें बंद करके प्रार्थना की शुरुआत करता है।)
उत्तर: नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं कृतवान्। (उसने आँखें बंद करके प्रार्थना की शुरुआत की।)
(ग) गुरुः विसोबा तम् अध्यापयति । (गुरु विसोबा उन्हें सिखाते/पढ़ाते हैं।)
उत्तर: गुरुः विसोबा तम् अध्यापितवान्। (गुरु विसोबा ने उन्हें सिखाया/पढ़ाया था।)
(घ) अहं शृणोमि । (मैं सुनता हूँ।)
उत्तर: अहं श्रुतवान् (मैंने सुना था।)
(ङ) सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कुर्वन्ति । (सज्जन लोग अपने कार्यों के द्वारा जन्म सार्थक करते हैं।)
उत्तर: सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः। (सज्जन लोगों ने अपने कार्यों के द्वारा जन्म सार्थक किया।)
(नोट: यहाँ ‘सत्पुरुषाः’ बहुवचन है, इसलिए ‘कृतवान्’ की जगह बहुवचन का रूप ‘कृतवन्तः’ प्रयुक्त हुआ है।)
(च) नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावति । (नामदेव कुत्ते के पीछे दौड़ते हैं।)
उत्तर: नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान्। (नामदेव कुत्ते के पीछे दौड़े थे।)
३. अधोलिखितानि कथनानि कः / का / कं / कां च प्रति कथयति इति लिखत –
यथा – हे देव ! शुष्कां रोटिकां न खादतु घृतमपि स्वीकरोतु ।
कः / का – नामदेवः
कं/कां प्रति – शुनकम्
(क) कथां श्रोतुम् इच्छतः वा? (क्या तुम दोनों कहानी सुनना चाहते हो?)
उत्तर:
कः / का (किसने कहा): मातामही
कं / कां प्रति (किससे कहा): कपिलं माधवीं च प्रति
(ख) अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान् इति । (मैंने सुना है कि उनके कीर्तन में स्वयं भगवान पांडुरंग ने नृत्य किया था।)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): माधवी
कं / कां प्रति (किससे कहा): मातामहीं प्रति
(ग) किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति? (क्या भगवान के साथ भी दोस्ती होना मुमकिन है?)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): कपिलः
कं / कां प्रति (किससे कहा): मातामहीं प्रति
(घ) अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु । (इसलिए, उस सर्वव्यापी (सबके अंदर रहने वाले) ईश्वर की पूजा करो।)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): गुरुः विसोबा
कं / कां प्रति (किससे कहा): नामदेवं प्रति
(ङ) नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु । (हे भगवान! भोग स्वीकार कीजिए और मेरी भक्ति को अचल (पक्का) कर दीजिए।)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): नामदेवः
कं / कां प्रति (किससे कहा): देवं पाण्डुरङ्गं प्रति
(च) धिक् शुनकम्। (धिक्कार है इस (दुष्ट) कुत्ते पर!)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): कपिलः
कं / कां प्रति (किससे कहा): मातामहीं प्रति
(छ) नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु? (नामदेव को निश्चित ही कितना अधिक दुःख हुआ होगा ना?)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): माधवी
कं / कां प्रति (किससे कहा): मातामहीं प्रति
(ज) किं घृतपात्रम् आधृत्य? (क्या घी का बर्तन लेकर (वह कुत्ते के पीछे दौड़े)?)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): कपिलः
कं / कां प्रति (किससे कहा): मातामहीं प्रति
(झ) अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु ईश्वरः निवसति इति। (आज मैं जान गया हूँ कि सभी जीवों में ईश्वर निवास करते हैं।)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): कपिलः
कं / कां प्रति (किससे कहा): मातामहीं प्रति
(ञ) उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्। (आप परीक्षा में पास (उत्तीर्ण) हो गए हैं।)
उत्तरम्:
कः / का (किसने कहा): भगवान् पाण्डुरङ्गः (शुनकरूपधारी पांडुरंग)
कं / कां प्रति (किससे कहा): नामदेवं प्रति (नामदेव से)
४. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत – (Page – 32)
यथा – पाण्डुरङ्गः नामदेवस्य मित्रम् आसीत्।
‘पाण्डुरङ्गः कस्य मित्रम् आसीत्?
(क) देवः नामदेवं परितः भवति स्म। (भगवान नामदेव के चारों ओर होते थे।)
प्रश्ननिर्माणम्: देवः कं परितः भवति स्म ? (भगवान किसके चारों ओर होते थे?)
(ख) ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति । (ईश्वर सभी जीवों में निवास करते हैं।)
प्रश्ननिर्माणम्: ईश्वरः केषु निवसति ? (ईश्वर किनमें/कहाँ निवास करते हैं?)
(ग) शुनकः आगत्य मुखे रोटिकां धृत्वा धावितवान्। (कुत्ता आकर मुँह में रोटी दबाकर दौड़ गया।
प्रश्ननिर्माणम्: शुनकः आगत्य मुखे कां धृत्वा धावितवान् ? (कुत्ता आकर मुँह में क्या दबाकर दौड़ गया?)
(घ) शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्। (कुत्ते के स्थान पर पांडुरंग प्रकट हो गए।)
प्रश्ननिर्माणम्: शुनकस्य स्थाने कः आविर्भूतवान्? (कुत्ते के स्थान पर कौन प्रकट हो गए?)
(ङ) आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः । (जो सभी जीवों को अपने समान देखता है, वह पंडित (ज्ञानी) है।)
प्रश्ननिर्माणम्: आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः कः? (जो सभी जीवों को अपने समान देखता है, वह कौन है?)
५. घटनाक्रमानु्सारं लिखत — (Page – 33)
(क) नामदेवः मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उद्घाटितवान् ।
(ख) नामदेवः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधावितवान्।
(ग) नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्।
(घ) शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान्।
(ङ) शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्।
(च) नामदेवः मन्दिरं गतवान् ।
उत्तर:
१. (च) नामदेवः मन्दिरं गतवान् । (नामदेव मंदिर गए।)
२. (ग) नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। (नामदेव ने भोग (प्रसाद) की थाली मूर्ति के सामने रखी।)
३. (क) नामदेवः मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उद्घाटितवान् । (नामदेव ने मंत्र का उच्चारण करके, श्रद्धा से प्रणाम करके आँखें खोलीं।)
४. (घ) शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान्। (कुत्ता सूखी रोटी छीनकर/लेकर भाग गया।)
५. (ख) नामदेवः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधावितवान्। (नामदेव घी का बर्तन लेकर (कुत्ते के) पीछे दौड़े।)
६. (ङ) शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्। (कुत्ते के स्थान पर पांडुरंग प्रकट हो गए।)
६. कोष्ठकेषु दत्तानां पदानाम् उचितां विभक्तिं योजयित्वा अनुच्छेदं पूरयत –
आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः
आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः । ………………. (क्षीर) सह तण्डुलाः पक्वाः। ………………. (शर्करा) विना कथं शक्यते। शीघ्रमेव ………………. (आपण) प्रति गत्वा शर्कराम् आनयतु। ………………. (आपण) निकषा वाहनानि तिष्ठन्ति। शर्करा महानसे स्थापिता। ………………. (शर्करा) परितः पिपीलिकाः आगताः । पिपीलिकाः अपनीय पायसे शर्करा योजिता। ………………. (मधुर) विना पायसं रुचिकरं न भवति। अधुना ………………. (पायस) परितः बालक-बालिकावृन्दं तिष्ठति। धिक् ………………. (अन्ये मधुरपदार्थाः) इति एकः वदति, ………………. (तत्) विना जीवनम् अपूर्णम् इति अपरः । ………………. (पायस) सह एव भोजनं सरसम् इति अन्यः । तेषां वचनानि श्रुत्वा पायसं यच्छन्त्याः अम्बायाः मुखे मन्दहासः विलसति ।
उत्तर:
आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः । क्षीरेण (क्षीर) सह तण्डुलाः पक्वाः। शर्करां (शर्करा) विना कथं शक्यते। शीघ्रमेव आपणं (आपण) प्रति गत्वा शर्कराम् आनयतु। आपणं (आपण) निकषा वाहनानि तिष्ठन्ति। शर्करा महानसे स्थापिता। शर्करां (शर्करा) परितः पिपीलिकाः आगताः । पिपीलिकाः अपनीय पायसे शर्करा योजिता। मधुरं (मधुर) विना पायसं रुचिकरं न भवति। अधुना पायसं (पायस) परितः बालक-बालिकावृन्दं तिष्ठति। धिक् अन्यान् मधुरपदार्थान् (अन्ये मधुरपदार्थाः) इति एकः वदति, तेन (तत्) विना जीवनम् अपूर्णम् इति अपरः । पायसेन (पायस) सह एव भोजनं सरसम् इति अन्यः । तेषां वचनानि श्रुत्वा पायसं यच्छन्त्याः अम्बायाः मुखे मन्दहासः विलसति
व्याख्या:
1. क्षीरेण (तृतीया विभक्ति – ‘सह’ के योग में)
2. शर्कराम् (द्वितीया विभक्ति – ‘विना’ के योग में)
3. आपणम् (द्वितीया विभक्ति – ‘प्रति’ के योग में)
4. आपणम् (द्वितीया विभक्ति – ‘निकषा’ के योग में)
5. शर्कराम् (द्वितीया विभक्ति – ‘परितः’ के योग में)
6. मधुरम् (द्वितीया विभक्ति – ‘विना’ के योग में)
7. पायसम् (द्वितीया विभक्ति – ‘परितः’ के योग में)
8. अन्यान् मधुरपदार्थान् (द्वितीया विभक्ति बहुवचन – ‘धिक्’ के योग में)
9. तेन (तृतीया विभक्ति – ‘विना’ के योग में)
10. पायसेन (तृतीया विभक्ति – ‘सह’ के योग में)
(आओ, खीर बनाते हैं। दूध के साथ चावल पक गए हैं। शक्कर के बिना कैसे हो सकता है (कैसे बनेगी)। जल्दी ही बाज़ार की ओर जाकर शक्कर ले आओ। बाज़ार के पास गाड़ियाँ खड़ी हैं। शक्कर रसोईघर में रख दी गई। शक्कर के चारों ओर चींटियाँ आ गईं। चींटियों को हटाकर खीर में शक्कर मिला दी गई। मीठे के बिना खीर स्वादिष्ट नहीं होती है। अब खीर के चारों ओर लड़के-लड़कियों का समूह खड़ा है। “अन्य मीठे पदार्थों को धिक्कार है!” ऐसा एक कहता है, “इसके बिना जीवन अधूरा है” ऐसा दूसरा कहता है। “खीर के साथ ही भोजन रसदार (मज़ेदार) होता है” ऐसा अन्य (तीसरा) कहता है। उनकी बातें सुनकर खीर देती हुई माता के मुख पर मुस्कान सुशोभित होती है।)
७. अनुच्छेदे स्थूलाक्षरेण दत्तानां क्रियापदानां स्थाने उचितं क्तवतुप्रत्ययान्तरूपं योजयित्वा पुनः लिखत –
कञ्चित् ग्रामं निकषा एका नदी आसीत्। नदी सर्वदा स्वच्छजलम् अददात्। जनाः तस्याः जलं पीत्वा सुखेन अजीवन्। एकः कृषकः तेन जलेन सर्वदा कृषिम् अकरोत्। कालान्तरम् अन्ये कृषकाः अपि तेन जलेन क्षेत्रसेचनम् अकुर्वन्। महिलाः पर्वसमये नदीम् अपूजयन्। एकवारं कश्चित् परिवारः नद्यां मालिन्यानि अक्षिपत्। क्रमशः अन्ये अपि अक्षिपन्। तेन नदी मलिना अभवत्, मीनाः अम्रियन्त। स्त्रियः रोगैः पीडिताः अभवन्। तदा एका शिक्षिता बालिका जलस्य महत्त्वं सर्वान् अवदत् । सा नदीतीरम् आगत्य स्वयं वृक्षम् अरोपयत्। महिलाः अपि ततः प्रेरणां प्राप्य तस्याः साहाय्यम् अकुर्वन्। सर्वे ग्रामवासिनः मिलित्वा नदीम् अशोधयन् । पुनः नदी स्वच्छा जाता निर्मलं जलं च अददात्। ततः आरभ्य वर्षे एकवारं जनाः नदीम् अपूजयन् वृक्षरोपणं च अकुर्वन् ।
उत्तर:
कञ्चित् ग्रामं निकषा एका नदी आसीत्। नदी सर्वदा स्वच्छजलम् दत्तवती। जनाः तस्याः जलं पीत्वा सुखेन जीवितवन्तः। एकः कृषकः तेन जलेन सर्वदा कृषिम् कृतवान्। कालान्तरम् अन्ये कृषकाः अपि तेन जलेन क्षेत्रसेचनम् कृतवन्तः। महिलाः पर्वसमये नदीम् पूजितवत्यः। एकवारं कश्चित् परिवारः नद्यां मालिन्यानि क्षिप्तवान्। क्रमशः अन्ये अपि क्षिप्तवन्तः। तेन नदी मलिना अभवत्, मीनाः मृतवन्तः। स्त्रियः रोगैः पीडिताः भूतवत्यः। तदा एका शिक्षिता बालिका जलस्य महत्त्वं सर्वान् उक्तवती। सा नदीतीरम् आगत्य स्वयं वृक्षम् आरोपितवती। महिलाः अपि ततः प्रेरणां प्राप्य तस्याः साहाय्यम् कृतवत्यः। सर्वे ग्रामवासिनः मिलित्वा नदीम् शोधितवन्तः। पुनः नदी स्वच्छा जाता निर्मलं जलं च दत्तवती। ततः आरभ्य वर्षे एकवारं जनाः नदीम् पूजितवन्तः वृक्षरोपणं च कृतवन्तः।
व्याख्या:
1. अददात् – दत्तवती (नदी स्त्रीलिंग एकवचन है)
2. अजीवन् – जीवितवन्तः (जनाः पुल्लिंग बहुवचन है)
3. अकरोत् – कृतवान् (कृषकः पुल्लिंग एकवचन है)
4. अकुर्वन् (कृषकाः) – कृतवन्तः (कृषकाः पुल्लिंग बहुवचन है)
5. अपूजयन् (महिलाः) – पूजितवत्यः (महिलाः स्त्रीलिंग बहुवचन है)
6. अक्षिप्तत् – क्षिप्तवान् (परिवारः पुल्लिंग एकवचन है)
7. अक्षिप्तन् – क्षिप्तवन्तः (अन्ये पुल्लिंग बहुवचन है)
8. अम्रियन्त – मृतवन्तः (मीनाः पुल्लिंग बहुवचन है)
9. अभवन् (स्त्रियः) – भूतवत्यः (स्त्रियः स्त्रीलिंग बहुवचन है)
10. अवदत् – उक्तवती (बालिका स्त्रीलिंग एकवचन है)
11. अरोपयत् – आरोपितवती (सा/बालिका स्त्रीलिंग एकवचन है)
12. अकुर्वन् (महिलाः) – कृतवत्यः (महिलाः स्त्रीलिंग बहुवचन है)
13. अशोधयन् – शोधितवन्तः (ग्रामवासिनः पुल्लिंग बहुवचन है)
14. अददात् – दत्तवती (नदी स्त्रीलिंग एकवचन है)
15. अपूजयन् (जनाः) – पूजितवन्तः (जनाः पुल्लिंग बहुवचन है)
16. अकुर्वन् (जनाः) – कृतवन्तः (जनाः पुल्लिंग बहुवचन है)
(किसी गाँव के पास एक नदी थी। नदी हमेशा साफ़ पानी देती थी। लोग उसका पानी पीकर सुख से जीते थे। एक किसान उस पानी से हमेशा खेती करता था। बाद में दूसरे किसानों ने भी उस पानी से खेतों की सिंचाई की। महिलाएँ त्योहारों के समय नदी की पूजा करती थीं। एक बार किसी परिवार ने नदी में गंदगी फेंक दी। धीरे-धीरे दूसरों ने भी (गंदगी) फेंकी। उससे नदी गंदी हो गई, मछलियाँ मर गईं। औरतें बीमारियों से पीड़ित हो गईं। तब एक पढ़ी-लिखी लड़की ने सबको पानी का महत्व बताया। वह नदी के किनारे आई और उसने खुद पेड़ लगाया। महिलाओं ने भी उससे प्रेरणा लेकर उसकी मदद की। सभी गाँव वालों ने मिलकर नदी को साफ़ किया। फिर से नदी साफ़ हो गई और साफ़ पानी देने लगी। तब से लेकर साल में एक बार लोग नदी की पूजा करते हैं और पेड़ लगाते हैं।)
८. एतेषां समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत – (Page – 34)
यथा – महान् आत्मा, तेषां – महात्मनाम्
(क) घृतस्य पात्रम्, तत्
(ख) पाषाणस्य खण्डः, तम्
(ग) प्रियः सुहृद्
(घ) उदरे वेदना
(ङ) स्वीयः व्यवहारः
(च) जीवनस्य मूल्यानि
(छ) मातुलस्य गृहम्, तत्
(ज) नरेषु रत्नानि इव, तेषाम्
(झ) स्वीयं कर्तृत्वम्, तेन
(ञ) अपराधस्य भावना, तया
(ट) गुरोः उपदेशः, तम्
(ठ) दिने दिने
(ड) राजा ऋषिः इव, तेषाम्
उत्तर:
(क) घृतस्य पात्रम्, तत् (घी का बर्तन, उसको) – घृतपात्रम् (घी का बर्तन)
(ख) पाषाणस्य खण्डः, तम् (पत्थर का टुकड़ा, उसको) – पाषाणखण्डम् (पत्थर का टुकड़ा)
(ग) प्रियः सुहृद् (प्यारा मित्र) – प्रियसुहृद् (प्रिय मित्र)
(घ) उरसि वेदना (हृदय/छाती में दर्द) – उरोवेदना (हृदय की वेदना)
(ङ) स्वीयः व्यवहारः (खुद का व्यवहार) – स्वीयव्यवहारः (अपना व्यवहार)
(च) जीवनस्य मूल्यानि (जीवन के मूल्य) – जीवनमूल्यानि (जीवन मूल्य)
(छ) मातुलस्य गृहम्, तत् (मामा का घर), उसको – मातुलगृहम् (मामा का घर)
(पाठ की कहानी में कपिल और माधवी अपनी नानी के घर (मातामही के घर) गए थे, परन्तु इस व्याकरण प्रश्न में ‘मातुल’ (मामा) शब्द का समस्तपद पूछा गया है, इसलिए इसका सही उत्तर ‘मातुलगृहम्’ ही होगा।)
(ज) नरेषु रत्नानि इव, तेषाम् (मनुष्यों में रत्नों के समान, उनका) – नररत्नानाम् (नर-रत्नों का)
(झ) स्वीयं कर्तृत्वम्, तेन (खुद का कार्य/कौशल, उससे) – स्वीयकर्तृत्वेन (अपने कर्तृत्व से)
(ञ) अपराधस्य भावना, तया (अपराध की भावना, उससे) – अपराधभावनया (अपराध की भावना से)
(ट) गुरोः उपदेशः, तम् (गुरु का उपदेश, उसको) – गुरूपदेशम् (गुरु के उपदेश को)
(ठ) दिने दिने (हर दिन) – प्रतिदिनम् (रोजाना)
(ड) राजा ऋषिः इव, तेषाम् (राजा जो ऋषि के समान हैं, उनका) – राजर्षीणाम् (राजर्षियों का)
छात्र इस पाठ में क्या गलतियाँ करते हैं? (Common Mistakes Made by Students)
१. व्याकरण और प्रसंग के बीच भ्रम
गलती: प्रश्न ३ (घ) और प्रश्न ८ (छ) में ‘मातुल’ (मामा) शब्द को देखकर छात्र कहानी के अनुसार नानी का घर (मातामही) समझ लेते हैं या ‘मक्खन’ जैसी गलत व्याख्या कर बैठते हैं।
बचाव: याद रखें कि यह केवल व्याकरण का अभ्यास है। कहानी में भले ही बच्चे नानी के घर गए थे, लेकिन व्याकरणिक रूप से ‘मातुलस्य गृहम्’ का सही समस्तपद हमेशा ‘मातुलगृहम्’ (मामा का घर) ही होगा।
२. क्तवतु प्रत्यय (भूतकाल) बदलते समय लिंग और वचन की अनदेखी
गलती: प्रश्न ७ (अनुच्छेद पूर्ति) में छात्र सभी जगह आँख बंद करके केवल ‘कृतवान्’ या ‘दत्तवान्’ (पुल्लिंग एकवचन) लिख देते हैं। जैसे—नदी स्वच्छजलम् अददात् को नदी स्वच्छजलम् दत्तवान् कर देते हैं।
बचाव: क्तवतु प्रत्यय के रूप कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार बदलते हैं। चूँकि ‘नदी’ स्त्रीलिंग एकवचन है, इसलिए वहाँ ‘दत्तवती’ होगा। इसी तरह ‘कृषकाः’ और ‘मीनाः’ बहुवचन हैं, तो वहाँ ‘कृतवन्तः’ और ‘मृतवन्तः’ का प्रयोग होगा।
३. प्रश्न निर्माण में प्रश्नवाचक चिह्न (?) न लगाना
गलती: प्रश्न ४ (प्रश्ननिर्माणम्) में छात्र रेखांकित शब्दों की जगह सही सर्वनाम रूप (कं, केषु, कां, कः) तो लिख देते हैं, लेकिन वाक्य के अंत में पूर्णविराम (।) ही छोड़ देते हैं।
बचाव: प्रश्न निर्माण करने के बाद वाक्य के अंत में प्रश्नवाचक चिह्न (?) लगाना अनिवार्य है, अन्यथा परीक्षा में अंक काट लिए जाते हैं।
४. उपपद विभक्तियों के नियमों को भूलना
गलती: प्रश्न ६ (रिक्त स्थान पूर्ति) में छात्र वाक्य के अर्थ के अनुसार गलत विभक्ति लगा देते हैं (जैसे—’सह’ के साथ द्वितीया लगा देना)।
बचाव: संस्कृत में कुछ विशेष शब्दों के साथ निश्चित विभक्तियाँ लगती हैं। जैसे:
‘सह’ के योग में हमेशा तृतीया विभक्ति (क्षीरेण, पायसेन) लगती है।
‘परितः’, ‘निकषा’, ‘प्रति’ और ‘धिक्’ के योग में हमेशा द्वितीया विभक्ति (आपणम्, शर्कराम्, अन्यान् मधुरपदार्थान्) लगती है।
५. ‘विना’ शब्द के साथ भ्रमित होना
गलती: ‘विना’ के योग में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी तीनों विभक्तियाँ सही होती हैं, जिससे छात्र देखकर भ्रमित हो जाते हैं।
बचाव: परीक्षा में किसी भी एक मानक विभक्ति का चयन करें। कक्षा 9 के स्तर पर द्वितीया विभक्ति का रूप ‘शर्कराम्’ या ‘मधुरम्’ लिखना सबसे सुरक्षित और आसान रहता है।
महत्वपूर्ण अतिलघु प्रश्नोत्तरी (Very Short Question and Answer)
(१) नामदेवः कस्य प्रियसुहृद् आसीत्? (नामदेव किसके प्रिय मित्र थे?)
उत्तर: पाण्डुरङ्गस्य
(२) कपिलः माधवी च कस्याः गृहं गतवन्तौ? (कपिल और माधवी किसके घर गए थे?)
उत्तर: मातामह्याः (नानी के)
(३) नामदेवस्य गुरुः कः आसीत्? (नामदेव के गुरु कौन थे?)
उत्तर: विसोबा
(४) शुनकः मुखे किम् धृत्वा धावितवान्? (कुत्ता मुँह में क्या दबाकर दौड़ गया?)
उत्तर: रोटिकाम्
(५) नामदेवः हस्तयोः किम् आधृत्य शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान्? (नामदेव हाथों में क्या लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े?)
उत्तर: घृतपात्रम्
(६) शुनकस्य स्थाने कः आविर्भूतवान्? (कुत्ते के स्थान पर कौन प्रकट हो गए?)
उत्तर: पाण्डुरङ्गः
(७) ‘धिक् शुनकम्’ इति कः अवदत्? (“कुत्ते पर धिक्कार है” ऐसा किसने कहा था?)
उत्तर: कपिलः
(८) नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां कस्य पुरतः स्थापितवान्? (नामदेव ने भोग की थाली किसके सामने रखी थी?)
उत्तर: विग्रहस्य (मूर्ति के)
(९) गुरुः विसोबा नामदेवं किम् अध्यापितवान्? (गुरु विसोबा ने नामदेव को क्या सिखाया था?)
उत्तर: आत्मवत्सर्वभूतेषु (सभी जीवों को अपने समान देखना)
(१०) नामदेवमहाराजस्य कथां श्रुत्वा प्रभावितौ भूत्वा कौ सङ्कल्पं कृतवन्तौ? (नामदेव महाराज की कहानी सुनकर प्रभावित होकर किन दोनों ने संकल्प लिया था?)
उत्तर: बालकौ (दोनों बालकों (कपिल और माधवी) ने)
महत्वपूर्ण लघु प्रश्नोत्तर (Short Question and Answer)
(१) कपिलः माधवी च कुत्र किमर्थं च गतवन्तौ? (कपिल और माधवी कहाँ और किसलिए गए थे?)
उत्तर: कपिलः माधवी च ग्रीष्मावकाशे विहारार्थं ज्ञानार्जनाय च स्वस्य मातामह्याः गृहं गतवन्तौ।
(कपिल और माधवी गर्मियों की छुट्टियों में घूमने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपनी नानी के घर गए थे।)
(२) मातामही बालकयोः कस्मात् व्यवहारात् खिन्ना अभवत्? (नानी बालकों के किस व्यवहार से दुखी/खिन्न हुईं?)
उत्तर: यदा बालकौ प्राङ्गणस्य समीपे उपविष्टं बुबुक्षितं शुनकं पाषाणखण्डेन मारयितुं धावितवन्तौ, तदा मातामही तयोः अस्याः जीव-हिंसायाः प्रवृत्तेः खिन्ना अभवत्।
(जब दोनों बालक आँगन के पास बैठे भूखे कुत्ते को पत्थर से मारने के लिए दौड़े, तब नानी उनकी इस जीव-हिंसा की आदत से दुखी हुईं।)
(३) नामदेवः बाल्यकाले कस्य पुरतः नैवेद्यस्थालिकां स्थापितवान्? (नामदेव ने बचपन में किसके सामने भोग (प्रसाद) की थाली रखी थी?)
उत्तर: नामदेवः बाल्यकाले मन्दिरं गत्वा पाण्डुरङ्गस्य विग्रहस्य पुरतः नैवेद्यस्थालिकां स्थापितवान्।
(नामदेव ने बचपन में मंदिर जाकर भगवान पांडुरंग की मूर्ति के सामने भोग की थाली रखी थी।)
(४) नामदेवः मन्दिरं गत्वा नेत्रे निमील्य किम् अकरोत्? (नामदेव ने मंदिर जाकर आँखें बंद करके क्या किया?)
उत्तर: नामदेवः मन्दिरं गत्वा नेत्रे निमील्य भगवतः प्रार्थनायाः आरम्भं कृतवान् यत् “हे देव! नैवेद्यं गृह्यतां मम भक्तिं च अचलां कुरु”।
(नामदेव ने मंदिर जाकर आँखें बंद करके भगवान से प्रार्थना शुरू की कि “हे भगवान! भोग स्वीकार कीजिए और मेरी भक्ति को अटूट बना दीजिए”।)
(५) मन्दिरे नेत्रे उद्घाट्य नामदेवः किम् अपश्यत्? (मंदिर में आँखें खोलकर नामदेव ने क्या देखा?)
उत्तरम्: मन्दिरे नेत्रे उद्घाट्य नामदेवः अपश्यत् यत् विग्रहः यथावत् अस्ति, स्थाली च नैवेद्येन पूरिता एव अस्ति अर्थात् देवेन नैवेद्यं न खादितम्।
(मंदिर में आँखें खोलकर नामदेव ने देखा कि मूर्ति वैसी की वैसी ही है और थाली भोग से भरी हुई है, अर्थात भगवान ने भोग नहीं खाया है।)
(६) शुनकः नामदेवस्य गृहात् किम् अपहृत्य पलायितवान्? (कुत्ता नामदेव के घर से क्या छीनकर भाग गया था?)
उत्तर: यदा नामदेवः पाकशालायां रोटिकां सज्जीकरोति स्म, तदा एकः शुनकः आगत्य तस्य मुखे शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान्।
(जब नामदेव रसोई में रोटी तैयार कर रहे थे, तब एक कुत्ता आया और मुँह में सूखी रोटी दबाकर भाग गया।)
(७) नामदेवः घृतपात्रं स्वीकृत्य शुनकस्य पृष्ठे किमर्थं धावितवान्? (नामदेव घी का बर्तन लेकर कुत्ते के पीछे क्यों दौड़े?)
उत्तर: नामदेवः अचिन्तयत् यत् मम आराध्यदेवः शुनकरूपेण आगतः अस्ति, स च क्षुधितः सन् शुष्करोटिकां खादति, अतः सः रोटिकायां घृतं लेपयितुं घृतपात्रं स्वीकृत्य धावितवान्।
(नामदेव ने सोचा कि मेरे आराध्य देव ही कुत्ते के रूप में आए हैं और वे भूखे होकर सूखी रोटी खा रहे हैं, इसलिए रोटी पर घी लगाने के लिए वे घी का बर्तन लेकर दौड़े।)
(८) शुनकस्य स्थाने भगवान् पाण्डुरङ्गः प्रकटितः भूत्वा नामदेवं किम् अवदत्? (कुत्ते के स्थान पर भगवान पांडुरंग ने प्रकट होकर नामदेव से क्या कहा?)
उत्तर: शुनकस्य स्थाने भगवान् पाण्डुरङ्गः आविर्भूतः भूत्वा नामदेवं अवदत् यत् “हे नामदेव! उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्, अद्यारभ्य अहं सदा त्वया सह भविष्यामि”।
(कुत्ते के स्थान पर भगवान पांडुरंग प्रकट हुए और उन्होंने नामदेव से कहा, “हे नामदेव! आप परीक्षा में पास हो गए हैं, आज से मैं हमेशा आपके साथ रहूँगा”।)
(९) कपिलः नामदेवस्य कथां श्रुत्वा किम् अवदत्? (कपिल नामदेव की कहानी सुनकर क्या बोला?)
उत्तर: कपिलः अवदत् यत् “अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु जीवेषु ईश्वरः निवसति, अतः प्राणिनां हिंसा न करणीया”।
(कपिल बोला कि “आज मैं जान गया हूँ कि सभी जीवों में ईश्वर रहते हैं, इसलिए प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए”।)
(१०) अन्ततः बालकौ मातामह्याः पुरतः कं सङ्कल्पं कृतवन्तौ? (अंत में दोनों बालकों ने नानी के सामने क्या संकल्प लिया?)
उत्तर: अन्ततः बालकौ सङ्कल्पं कृतवन्तौ यत् “अद्यारभ्य आवां कदापि प्राणिनां हिंसां न करिष्यावः, प्राणिमात्रं प्रति च दयाभावं धरिष्यावः”।
(अंत में दोनों बालकों ने संकल्प लिया कि “आज से हम दोनों कभी भी प्राणियों की हिंसा नहीं करेंगे और हर जीव के प्रति दया का भाव रखेंगे”।)
महत्वपूर्ण FAQs (Frequently Asked Questions)
१. ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ इति पाठस्य मुख्यः सन्देशः कः अस्ति? (‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ इस पाठ का मुख्य संदेश क्या है?)
उत्तर: अस्य पाठस्य मुख्यः सन्देशः ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ अर्थात् सर्वेषु जीवेषु ईश्वरस्य दर्शनं करणीयम्, प्राणिमात्रं प्रति च दयाभावः रखणीयः इति अस्ति।
(इस पाठ का मुख्य संदेश ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ है, अर्थात् सभी जीवों में ईश्वर के दर्शन करने चाहिए और प्राणिमात्र के प्रति दया का भाव रखना चाहिए।)
२. सन्त-नामदेवः बाल्यकाले कस्य विग्रहस्य पुरतः नैवेद्यं स्थापितवान्? (संत नामदेव ने बचपन में किस मूर्ति के सामने भोग (प्रसाद) रखा था?)
उत्तर: सन्त-नामदेवः बाल्यकाले भगवतः पाण्डुरङ्गस्य (विट्ठलदेवस्य) विग्रहस्य पुरतः नैवेद्यं स्थापितवान्।
(संत नामदेव ने बचपन में भगवान पांडुरंग (विट्ठल देव) की मूर्ति के सामने भोग रखा था।)
३. नामदेवस्य गुरुः कः आसीत्, सः नामदेवं किम् अध्यापितवान्? (नामदेव के गुरु कौन थे और उन्होंने नामदेव को क्या सिखाया था?)
उत्तर: नामदेवस्य गुरुः सन्त-विसोबा आसीत्, सः नामदेवं ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ (सर्वेषु जीवेषु समदृष्टिः) इति अध्यापितवान्।
(नामदेव के गुरु संत विसोबा थे, उन्होंने नामदेव को ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ (सभी जीवों को अपने समान देखना/समान दृष्टि रखना) सिखाया था।)
४. शुनकः नामदेवस्य गृहात् किम् अपहृत्य धावितवान्? (कुत्ता नामदेव के घर से क्या छीनकर दौड़ा था?)
उत्तर: शुनकः नामदेवस्य गृहात् एकाम् शुष्करोटिकाम् अपहृत्य धावितवान्।
(कुत्ता नामदेव के घर से एक सूखी रोटी छीनकर दौड़ा था।)
५. नामदेवः हस्तयोः घृतपात्रं स्वीकृत्य शुनकस्य पृष्ठे किमर्थं धावितवान्? (नामदेव हाथों में घी का बर्तन लेकर कुत्ते के पीछे क्यों दौड़े थे?)
उत्तर: नामदेवः शुनकरूपिणे भगवते शुष्करोटिकायां घृतं लेपयितुं घृतपात्रं स्वीकृत्य धावितवान्।
(नामदेव कुत्ते के रूप में आए भगवान की सूखी रोटी पर घी लगाने के लिए घी का बर्तन लेकर दौड़े थे।)
६. शुनकस्य स्थाने कः आविर्भूतवान्, सः नामदेवं किम् अवदत्? (कुत्ते के स्थान पर कौन प्रकट हुआ और उन्होंने नामदेव से क्या कहा?)
उत्तर: शुनकस्य स्थाने स्वयं भगवान् पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्, सः अवदत् च—”उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्”।
(कुत्ते के स्थान पर स्वयं भगवान पांडुरंग प्रकट हुए और उन्होंने कहा—”आप परीक्षा में पास हो गए हैं”)
७. ‘मातुलस्य गृहम्, तत्’ अस्य व्याकरणिकं समस्तपदं किम् अस्ति? (‘मातुलस्य गृहम्, तत्’ इसका व्याकरणिक समस्तपद (Compound Word) क्या है?)
उत्तर: अस्य व्याकरणिकं समस्तपदं ‘मातुलगृहम्’ (मामा का घर) इति अस्ति।
(इसका व्याकरणिक समस्तपद ‘मातुलगृहम्’ (मामा का घर) है।)
८. कपिल-माधव्योः मुखे किमर्थं म्लाने संजाते? (कपिल और माधवी के चेहरे किसलिए उतर (मुरझा) गए थे?)
उत्तर: नानीमुखात् सन्त-नामदेवस्य शुनक-प्रसङ्गं श्रुत्वा स्वस्याः अज्ञानतायाः लज्जावशात् च तयोः मुखे म्लाने संजाते।
(नानी के मुँह से संत नामदेव और कुत्ते का प्रसंग सुनकर अपनी अज्ञानता और शर्म के कारण उन दोनों के चेहरे उतर गए थे।)
९. नामदेवमहाराजस्य कथां श्रुत्वा बालकौ कं सङ्कल्पं कृतवन्तौ? (नामदेव महाराज की कहानी सुनकर बालकों ने क्या संकल्प लिया?)
उत्तर: बालकौ सङ्कल्पं कृतवन्तौ यत् अद्यारभ्य आवां कदापि प्राणिनां हिंसां न करिष्यावः, दयाभावं च धरिष्यावः।
(बालकों ने संकल्प लिया कि आज से हम दोनों कभी भी प्राणियों की हिंसा नहीं करेंगे और दया का भाव रखेंगे।)
१०. ‘क्षीरेण सह तण्डुलाः पक्वाः’ अत्र ‘क्षीरेण’ पदे का विभक्तिः अस्ति? (‘क्षीरेण सह तण्डुलाः पक्वाः’ यहाँ ‘क्षीरेण’ पद में कौन सी विभक्ति है?)
उत्तर: अत्र ‘सह’ शब्दस्य योगे ‘क्षीरेण’ पदे तृतीया विभक्तिः अस्ति।
(यहाँ ‘सह’ शब्द के योग (कारण) से ‘क्षीरेण’ पद में तृतीया विभक्ति है।)
