एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 11 झाँसी की रानी प्रश्न उत्तर

कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 11 – झाँसी की रानी के प्रश्न-उत्तर, कठिन शब्दों के अर्थ, कविता का सारांश, व्याकरण संबंधी अभ्यास तथा परीक्षा उपयोगी अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर यहाँ सरल भाषा में दिए गए हैं। यह अध्याय प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित वीर रस की लोकप्रिय कविता पर आधारित है। कविता में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के साहस, नेतृत्व, आत्मसम्मान और देशभक्ति का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

कविता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं को रोचक कथात्मक शैली में प्रस्तुत करती है। रानी लक्ष्मीबाई के बचपन, उनके संघर्ष, अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध तथा मातृभूमि के लिए दिए गए बलिदान का वर्णन पाठकों को प्रेरित करता है। यह कविता केवल ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि युवाओं में साहस, राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा की भावना भी जागृत करती है।

मेरे उत्तर मेरे तर्क –  (पेज 184 के प्रश्न और उत्तर)

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

1. ‘झाँसी की रानी’ कविता की पंक्ति “बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी” में ‘नई जवानी’ शब्द किस भाव को व्यक्त करता है?

(क) देश का स्वाभिमान

(ख) विद्रोह की चिनगारी

(ग) स्वाधीनता का भय

(घ) भारत की युवावस्था

सही विकल्प: (ख) विद्रोह की चिनगारी

उत्तर: यहाँ ‘नई जवानी’ शब्द वर्षों की गुलामी से हताश हो चुके भारत में अंग्रेजों के खिलाफ उठने वाली विद्रोह की चिनगारी को व्यक्त करता है। लक्ष्मीबाई के साहस ने देशवासियों के दिलों में स्वतंत्रता की नई चेतना जगाकर नया जोश भर दिया।

व्याख्या: सुभद्रा कुमारी चौहान जी ने तत्कालीन परिस्थितियों का सजीव वर्णन किया है। सौ साल की गुलामी झेलते-झेलते भारतीय राजवंश और आम जनता हताश हो चुके थे, मानो पूरा देश शक्तिहीन हो गया हो। सन् 1857 में जब रानी लक्ष्मीबाई ने रणचंडी का रूप धारण कर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंका, तो उनके इस अदम्य साहस को देखकर पूरे भारत में गुलामी की जंजीरें तोड़ने का एक नया संकल्प जाग उठा। यही कारण है कि इस सामूहिक विद्रोह की चिनगारी को ‘नई जवानी’ कहा है।

2. लक्ष्मीबाई को ‘छबीली’ कहना उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?

(क) विनम्रता

(ख) शोभायुक्त

(ग) सहिष्णुता

(घ) कठोरता

सही विकल्प: (ख) शोभायुक्त

उत्तर: लक्ष्मीबाई को बचपन में ‘छबीली’ कहना उनके अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और शोभायुक्त व्यक्तित्व को दर्शाता है। कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन के रूप में वे अपनी चंचलता और अद्भुत शारीरिक आकर्षण से सबका मन मोह लेती थीं।

व्याख्या: लक्ष्मीबाई का बचपन आम बालिकाओं से बिल्कुल अलग था। वे अत्यंत तेजस्वी और सजीली थीं, जिसके कारण उन्हें लाड से ‘छबीली’ पुकारा जाता था। उनके इस शोभायुक्त स्वरूप के भीतर अद्भुत वीरता छिपी थी। जहाँ अन्य लड़कियाँ गुड़ियों से खेलती थीं, वहीं उनकी सहेलियाँ बरछी, ढाल और कटारी थीं। उनका चेहरा और शारीरिक गठन साक्षात् वीरता के अवतार जैसा सुंदर और शोभायुक्त था, जिसे देखकर मराठे भी बहुत पुलकित हो उठते थे।

3. “बुझा दीप झाँसी का” पंक्ति का भावार्थ है –

(क) अंग्रेजों का झाँसी पर अधिकार हो जाना

(ख) झाँसी राज्य की उम्मीदों का नष्ट हो जाना

(ग) राजा की आकस्मिक मृत्यु होना

(घ) रानी के जीवन में उदासी होना

सही विकल्प: (ग) राजा की आकस्मिक मृत्यु होना

उत्तर: इस पंक्ति का सटीक भावार्थ राजा गंगाधर राव की अचानक और निःसंतान मृत्यु होना है। झाँसी के राजा जब असमय स्वर्ग सिधार गए, तो वहां का राजकुल नेतृत्वविहीन हो गया और एकमात्र सहारा पूरी तरह समाप्त हो गया।

व्याख्या: राजा गंगाधर राव झाँसी राज्य के दीपक और रक्षक थे। उनके असमय और निःसंतान निधन से राजमहल में चारों ओर शोक छा गया और रानी विधवा हो गईं। राजा की मृत्यु झाँसी के लिए एक बहुत बड़ा वज्रपात थी, जिसने पूरे राज्य को लावारिस और कमजोर बना दिया। इसी दुःखद और आकस्मिक घटना के कारण झाँसी का गौरवशाली दीपक बुझ गया, जिसका फायदा उठाकर क्रूर डलहौजी मन में बेहद हर्षाया और उसने राज्य हड़पने की साज़िश रची।

4. “इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम” पंक्ति में स्वतंत्रता आंदोलन की किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है?

(क) असहयोग आंदोलन

(ख) भारत छोड़ो आंदोलन

(ग) 1857 की क्रांति

(घ) सविनय अवज्ञा आंदोलन

सही विकल्प: (ग) 1857 की क्रांति

उत्तर: यह पंक्ति भारतीय इतिहास के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी सन् 1857 की महान सैन्य और जन-क्रांति की ओर संकेत करती है। इस महायज्ञ में नाना धुंधूपंत, ताँतिया टोपे और कुँवरसिंह जैसे महान वीरों ने अपना सर्वस्व बलिदान दिया था।

व्याख्या: सुभद्रा कुमारी चौहान जी की यह अमर रचना मुख्य रूप से सन् सत्तावन में चमकी तलवार की गाथा है। असहयोग या भारत छोड़ो आंदोलन बीसवीं सदी के गांधीवादी युग की घटनाएँ हैं, जबकि इस कविता में नाना धुंधूपंत पेशवा, अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी और ठाकुर कुँवरसिंह जैसे वीरों के नाम आए हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था। इसलिए यह महायज्ञ 1857 की महान क्रांति ही है जिसमें देश के वीरों ने आहुति दी थी।

5. “व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया” पंक्ति में ‘यह’ शब्द किसके लिए कहा गया है?

(क) नवाबों के लिए

(ख) जनरल डलहौजी के लिए

(ग) लेफ्टिनेंट वॉकर के लिए

(घ) ब्रिटिश राज के लिए

सही विकल्प: (घ) ब्रिटिश राज के लिए

उत्तर: यहाँ ‘यह’ शब्द ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज के शासकों के लिए प्रयुक्त हुआ है। अंग्रेज शुरुआत में भारत में साधारण व्यापारी बनकर आए थे और यहाँ के राजाओं-नवाबों से केवल व्यापार करने के लिए दया मांगते थे।

व्याख्या: कवियित्री ने अंग्रेजों की कुटिल शासन नीति पर तीखा प्रहार किया है। ब्रिटिश राज (ईस्ट इंडिया कंपनी) शुरुआत में बेहद साधारण और लाचार व्यापारी बनकर भारत की धरती पर आया था और यहाँ के राजाओं-नवाबों से व्यापार के लिए दया चाहता था। परंतु धीरे-धीरे डलहौजी जैसे शासकों ने अपनी हड़प नीति के माध्यम से पूरे देश में पैर पसार लिए, हमारी स्वतंत्रता छीन ली और स्वयं यहाँ के राजा बन बैठे। इसलिए ‘यह’ शब्द संपूर्ण ब्रिटिश हुकूमत को दर्शाता है।

मेरी समझ मेरे विचार –  (पेज 185 के प्रश्न और उत्तर)

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

1. ‘झाँसी की रानी’ कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल कौन-कौन से थे? उनका बचपन दूसरों से किस प्रकार भिन्न था?

उत्तर: लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल नकली युद्ध करना, व्यूह की रचना, शिकार खेलना, सेना घेरना और किले तोड़ना थे। उनका बचपन सामान्य लड़कियों से भिन्न था क्योंकि वे गुड़ियों के बजाय बरछी, ढाल और कटारी से खेलती थीं।

व्याख्या: झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का बचपन आम बालिकाओं की तुलना में अत्यंत असाधारण और अद्वितीय था। जहाँ साधारण लड़कियाँ बचपन में गुड़िया-खिलौनों से खेलती थीं और घरेलू कार्यों में रुचि लेती थीं, वहीं लक्ष्मीबाई को बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र चलाने का शौक था। वे अपने मुँहबोले भाई नाना धुंधूपंत के साथ पढ़ती और खेलती थीं। बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी ही उनकी वास्तविक सहेलियाँ थीं। वे खेल-खेल में ही युद्ध कौशल और सैन्य संचालन की कला सीख रही थीं।

2. “किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई” पंक्ति के माध्यम से किस घटना की ओर संकेत किया गया है?

उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से झाँसी के राजा गंगाधर राव की अचानक बीमारी और आकस्मिक मृत्यु की ओर संकेत किया गया है। राजा की मृत्यु से रानी अत्यंत कम उम्र में विधवा हो गईं और पूरा राज्य शोक में डूब गया।

व्याख्या: कवयित्री ने इस पंक्ति के द्वारा झाँसी के सुखद दिनों के अचानक समाप्त होने की अत्यंत दुखद घटना को रेखांकित किया है। विवाह के बाद रानी लक्ष्मीबाई के आने से झाँसी के महलों में जो खुशियाँ और सौभाग्य का उजियारा छाया था, वह अधिक समय तक नहीं टिक सका। समय का क्रूर चक्र झाँसी पर विपत्ति के बादल ले आया। राजा गंगाधर राव असमय और निःसंतान ही मृत्यु को प्राप्त हो गए, जिससे रानी के जीवन में गहरा अंधकार छा गया।

3. “महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी” पंक्ति समाज के विभिन्न वर्गों की एकता को दर्शाती है, इस एकता का स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में क्या महत्व है?

उत्तर: यह पंक्ति अमीर-गरीब और राजा-प्रजा सहित संपूर्ण समाज की सामूहिक एकजुटता को दर्शाती है। इस राष्ट्रिय एकता के कारण ही सन् 1857 की क्रांति ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को पूरी तरह हिलाने में सफल हो सकी थी।

व्याख्या: स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में इस सामाजिक एकता का अत्यधिक ऐतिहासिक महत्व था। अंग्रेजों के अत्याचारों से अमीर-गरीब, राजा और प्रजा सभी समान रूप से पीड़ित थे। जब स्वतंत्रता की चिनगारी भड़की, तो महलों के शासकों (नाना साहब, ताँतिया टोपे) और झोंपड़ियों के आम नागरिकों ने मिलकर संघर्ष किया। इस सामूहिक राष्ट्रिय चेतना और अखंड एकता ने बिखरे हुए समाज को एक सूत्र में बांध दिया, जिसके कारण पहली बार ब्रिटिश हुकूमत को भारत में भारी पराजय का सामना करना पड़ा।

4. “सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार” पंक्ति में ‘नीलाम छापते’ शब्द किसकी ओर संकेत करता है? यह भी बताइए कि किसकी नीलामी की जाती थी और क्यों?

उत्तर: ‘नीलाम छापते’ शब्द अंग्रेजों द्वारा भारतीय राज्यों के वैभव को बाजार में बेचने की क्रूरता की ओर संकेत करता है। अंग्रेज नवाबों के गहने, नौलख हार और कपड़े कलकत्ता के बाजारों में सरेआम नीलाम करते थे ताकि उन्हें अपमानित कर सकें।

व्याख्या: यह पंक्ति अंग्रेजों की अमानवीय और दमनकारी व्यापारिक नीति को उजागर करती है। जब लॉर्ड डलहौजी ने कुटिलतापूर्वक देसी रियासतों पर अधिकार कर लिया, तो उन्होंने भारतीय राजवंशों के मान-सम्मान को कुचलने का प्रयास किया। नागपुर के कीमती जेवर और लखनऊ के प्रसिद्ध नौलख हार कलकत्ता के बाजारों में सरेआम बेचे जाते थे। ब्रिटिश अखबारों में इन नीलामियों के विज्ञापन छपते थे, जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय शासकों की इज्जत को लूटना और अपनी तिजोरियाँ भरना था।

5. “अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी” पंक्ति में ‘अवतारी’ शब्द व्यक्ति के विशेष गुणों की ओर इंगित कर रहा है। कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के किन गुणों के कारण उनको ‘अवतारी’ कहा गया है?

उत्तर: लक्ष्मीबाई को उनके अदम्य साहस, अपूर्व वीरता, देशभक्ति, रण-कौशल और आत्म बलिदान जैसे दिव्य गुणों के कारण ‘अवतारी’ कहा गया है। मात्र तेइस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने अकेले ही विशाल अंग्रेजी सेना का डटकर सामना किया था।

व्याख्या: रानी लक्ष्मीबाई को ‘अवतारी’ इसलिए कहा गया क्योंकि उनके कृत्य किसी साधारण मनुष्य के वश में नहीं थे। इतनी कम उम्र में उन्होंने वीरता की साक्षात् प्रतिमूर्ति बनकर पुरुषों के वर्चस्व वाले युद्धक्षेत्र में शत्रु सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। वे अद्भुत तलवारबाज, कुशल रणनीतिकार और निडर योद्धा थीं। मातृभूमि की रक्षा के लिए उनका सर्वस्व न्योछावर कर देना और देशवासियों में आज़ादी की अलख जगाना उन्हें साक्षात् देवी या किसी दिव्य ईश्वरीय अवतार के समकक्ष स्थापित करता है।

विधा से संवाद (कविता में कहानी) –  (पेज 186 के प्रश्न और उत्तर)

1. यह कविता लक्ष्मीबाई के जीवन की घटनाओं पर आधारित है और अपनी संरचना में एक कथात्मक कविता है। पाठ की संरचना को समझते हुए इसमें वर्णित प्रमुख घटनाओं को समय-रेखा (टाइमलाइन) पर दर्शाइए।

उत्तर: लक्ष्मीबाई की जीवन-रेखा इस प्रकार है: कानपुर में बीता बचपन और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा, राजा गंगाधर राव से विवाह, राजा का निधन, डलहौजी द्वारा झाँसी पर कब्ज़ा, स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी और अंत में वीरगति।

व्याख्या: कवयित्री ने सुभद्रा कुमारी चौहान जी ने रानी लक्ष्मीबाई के जीवन को एक संपूर्ण कथा के रूप में पिरोया है। समय-रेखा के अनुसार सबसे पहले उनका छबीली के रूप में बचपन और शिवाजी की गाथाएँ याद करना आता है। इसके बाद झाँसी में उनका वैभवशाली विवाह और फिर अचानक राजा की मृत्यु से उपजा संकट दिखाई देता है। अंत में, 1857 के महायज्ञ में विभिन्न युद्धों को लड़ते हुए उनका सर्वोच्च बलिदान मुख्य घटना है।

विषयों से संवाद (साझा साथ/साझा संघर्ष)

1. “लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया”, ब्रिटिश राज किस नीति के कारण ‘लावारिस का वारिस’ बन जाता था? अपने इतिहास के शिक्षक से पता लगाकर उस नीति के विषय में लिखिए।

उत्तर: ब्रिटिश राज ‘हड़प नीति’ या ‘व्यपगत का सिद्धांत’ (Doctrine of Lapse) के कारण लावारिस का वारिस बनता था। इस कुटिल नीति के तहत किसी राजा के निःसंतान मरने पर उसका राज्य अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया जाता था।

व्याख्या: ‘व्यपगत का सिद्धांत’ (Doctrine of Lapse) – लॉर्ड डलहौजी ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने के लिए ‘डॉकट्रिन ऑफ लैप्स’ यानी हड़प नीति लागू की थी। इस नियम के अनुसार, यदि कोई भारतीय शासक बिना किसी प्राकृतिक उत्तराधिकारी या पुत्र के मर जाता था, तो उसे गोद लेने का अधिकार नहीं था। उस राज्य को लावारिस मानकर ब्रिटिश हुकूमत जबरन अपने नियंत्रण में ले लेती थी। झाँसी के राजा गंगाधर राव की निःसंतान मृत्यु होते ही अंग्रेजों ने इसी नीति से झाँसी को हड़प लिया था।

2. इस कविता में लक्ष्मीबाई की जीवन-गाथा के साथ-साथ अनेक वीरों के त्याग और बलिदान का भी उल्लेख है। उनकी सूची बनाइए तथा 1857 की क्रांति में उनके योगदान के विषय में लिखिए।

उत्तर: कविता में मुख्य रूप से नाना धुंधूपंत, ताँतिया टोपे, चतुर अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी और ठाकुर कुँवरसिंह जैसे महान वीरों का उल्लेख मिलता है। इन जाँबाज़ों ने देशव्यापी स्तर पर सैन्य और वैचारिक विद्रोह का नेतृत्व कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता की महाक्रांति का बिगुल फूंका था।

व्याख्या: सुभद्रा कुमारी चौहान जी ने इस ऐतिहासिक कविता में झाँसी की रानी के साथ-साथ उन सभी मुख्य नायकों को सम्मान सहित याद किया है, जिन्होंने इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था। इन वीरों के नाम और उनके महान योगदान का पूरा विवरण इस प्रकार है:

1857 की क्रांति के प्रमुख वीर और उनका योगदान (तालिका):

वीर योद्धा का नाम    मुख्य कार्यक्षेत्र (विद्रोह का केंद्र)1857 की क्रांति में मुख्य योगदान और भूमिका  
नाना धुंधूपंत पेशवाकानपुर और बिठूरक्रांति के मुख्य रणनीतिकार, सैन्य संगठन और युद्ध सामग्री जुटाने का कार्य किया।  
ताँतिया टोपेकानपुर, कालपी और ग्वालियरअपनी अद्वितीय छापामार युद्ध नीति से अंग्रेजी सेना को छकाया और अंत तक रानी का साथ दिया।  
चतुर अज़ीमुल्ला खानकानपुर और अवध क्षेत्र  राजनैतिक कूटनीतिज्ञ, राजाओं-नवाबों को एकजुट करने और क्रांति का प्रचार करने में सक्रिय भूमिका निभाई।  
अहमद शाह मौलवीफैजाबाद, अवध और लखनऊजनता और सैनिकों में धार्मिक व राष्ट्रिय चेतना जगाकर अंग्रेजों के खिलाफ व्यापक जन-विद्रोह खड़ा किया।  
ठाकुर कुँवरसिंहजगदीशपुर (बिहार)अस्सी वर्ष की वृद्ध आयु में भी अद्भुत वीरता दिखाई और अंतिम सांस तक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे।  

प्रत्येक वीर का गहरा योगदान:

नाना धुंधूपंत पेशवा:

उन्होंने कानपुर में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका और खुद को पेशवा घोषित कर शासन अपने हाथ में लिया। वे रानी लक्ष्मीबाई के मुँहबोले भाई थे और उन्होंने इस राष्ट्रिय महायज्ञ को प्रारंभ करने के लिए देश के अन्य राजाओं को गुप्त संदेश भेजे तथा युद्ध के लिए भारी मात्रा में रसद और सैन्य सामान जुटाने का सबसे बड़ा दायित्व निभाया था।

ताँतिया टोपे:

नाना साहब के सबसे विश्वसनीय और कुशल सेनापति ताँतिया टोपे 1857 की क्रांति के सबसे महान सैन्य नायक माने जाते हैं। उन्होंने अपनी अद्भुत छापामार युद्ध शैली (Guerilla Warfare) के बल पर ब्रिटिश सेना की नाक में दम कर दिया था। जब झाँसी पर डलहौजी की सेना ने कब्ज़ा करने की कोशिश की और बाद में कालपी के मैदान में भी वे अपनी सेना लेकर रानी लक्ष्मीबाई की ढाल बनकर खड़े रहे और ग्वालियर पर अधिकार करने में मुख्य भूमिका निभाई।

चतुर अज़ीमुल्ला खान:

वे नाना साहब के मुख्य सलाहकार और कूटनीतिक दूत थे। अज़ीमुल्ला ने न केवल भारत के भीतर बल्कि विदेशों में भी जाकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ समर्थन जुटाने का प्रयास किया था। उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और ओजस्वी विचारों से विभिन्न रियासतों के शासकों को एक मंच पर लाकर इस महान सैन्य विद्रोह की रूपरेखा तैयार करने में मुख्य वैचारिक योगदान दिया।

अहमद शाह मौलवी:

मौलवी अहमद शाह ने पूरे अवध और लखनऊ क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की एक ऐसी तगड़ी आग सुलगाई कि आम जनता भी सैनिकों के साथ युद्ध के मैदान में कूद पड़ी। उन्होंने अपनी बेहतरीन वक्तृत्व कला और ओजपूर्ण भाषणों से सोई हुई जनता की ज्योति को जगाया और अंग्रेजों के खिलाफ एक बहुत बड़ा जन-आंदोलन खड़ा कर दिया, जिससे ब्रिटिश हुकूमत अंदर तक कांप उठी थी।

ठाकुर कुँवरसिंह:

बिहार के जगदीशपुर के जमींदार ठाकुर कुँवरसिंह ने अस्सी वर्ष की उम्र में जो युद्ध कौशल और युवाओं जैसा अदम्य उत्साह दिखाया, वह अविस्मरणीय है। जब एक युद्ध के दौरान अंग्रेजों की एक जहरीली गोली उनकी कलाई में लग गई, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के अपनी तलवार से अपना ही हाथ काटकर गंगा मैया को भेंट कर दिया। वे अपनी अंतिम सांस तक अदम्य साहस के साथ लड़ते रहे और अपने क्षेत्र को अंग्रेजों से मुक्त कराया।

3. यह कविता जिस समय और परिवेश में लिखी गई है, उसमें युद्ध और अन्य साहसिक कार्य करना सामान्यतः पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। वर्तमान में लगभग हर क्षेत्र में महिलाएँ कार्य कर रही हैं। नीचे दिए गए कार्यक्षेत्रों में काम करने वाली स्त्रियों के नाम और उनके विषय में लिखिए:

उत्तर: वर्तमान में रूढ़ियों को तोड़कर महिलाएँ हर क्षेत्र में परचम लहरा रही हैं। उदाहरण के लिए, सैन्य क्षेत्र में भावना कंठ (भारत की पहली महिला फाइटर पायलट) और खेल व साहसिक क्षेत्र में बछेंद्री पाल (माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला) ने इतिहास रचा है।

व्याख्या: 1. दमकल केंद्र (फायर ब्रिगेड): भारत की पहली महिला फायर फाइटर हर्षिनी कान्हेकर हैं। उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले इस साहसिक क्षेत्र को चुनकर दमकल केंद्र में कदम रखा और देश की अग्नि शमन सेवाओं में महिलाओं के लिए नया मार्ग खोला।

2. रेलगाड़ी चालक: एशिया की पहली महिला लोको पायलट (रेलगाड़ी चालक) सुरेखा यादव हैं। सुरेखा यादव ने सन् 1988 में भारतीय रेलवे में बतौर सहायक लोको पायलट काम शुरू किया था। उन्होंने भारतीय रेलवे में ट्रेन चालक बनकर रूढ़ियों को तोड़ा और वर्तमान में वे देश की सबसे तेज़ ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ भी चला रही हैं।

3. खेल के विभिन्न क्षेत्र: खेल के क्षेत्र में भारत की उड़न परी पी.टी. उषा और बैडमिंटन चैंपियन पी.वी. सिंधु प्रमुख हैं। इन महिला खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ओलंपिक और एशियाई खेलों में भारत को स्वर्ण तथा रजत पदक दिलाए हैं।

4. व्यापार और प्रबंधन: व्यापार जगत में ‘नायका’ (Nykaa) की संस्थापक फाल्गुनी नायर और बायोकॉन की प्रमुख किरण मजूमदार शॉ शीर्ष पर हैं। इन महिलाओं ने सफल व्यावसायिक साम्राज्य खड़े कर देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दिया है।

5. विज्ञान और तकनीक: इसरो (ISRO) की प्रसिद्ध वैज्ञानिक ऋतु कारिधाल हैं, जिन्हें भारत की ‘रॉकेट वुमन’ कहा जाता है। उन्होंने देश के ऐतिहासिक ‘मंगलयान’ और ‘चंद्रयान’ जैसे अंतरिक्ष अभियानों में डिप्टी ऑपरेशंस डायरेक्टर के रूप में मुख्य भूमिका निभाई। ऋतु कारिधाल ने गणित और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के कठिन सिद्धांतों से भारत के जटिल अंतरिक्ष मिशनों को सफल बनाया। उनकी इस तकनीकी विशेषज्ञता और कुशल वैज्ञानिक नेतृत्व ने वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन कर बेटियों को विज्ञान क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

निष्कर्ष:

आज की आधुनिक महिलाएँ सदियों पुरानी रूढ़ियों और सीमाओं को पूरी तरह तोड़ चुकी हैं। खेल के मैदान से लेकर अंतरिक्ष और सेना के जटिल मोर्चों तक, हर कठिन कार्यक्षेत्र में महिलाओं की यह बढ़ती भागीदारी इस बात का साक्षात् प्रमाण है कि अब साहस, तकनीक और नेतृत्व केवल पुरुषों का क्षेत्र नहीं रह गया है।

4. कविता में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित अनेक स्थानों के नाम आए हैं। अपने शिक्षक की सहायता से दिए गए मानचित्र में उन स्थानों/नगरों को चिह्नित करके नाम लिखिए।

उत्तर:  कविता में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेक स्थानों का उल्लेख हुआ है। मानचित्र में झाँसी, कानपुर, बिठूर, मेरठ, लखनऊ, दिल्ली, पटना, ग्वालियर, जबलपुर, नागपुर, सतारा, कोल्हापुर, उदयपुर, तंजोर, कर्नाटक, सिंध, पंजाब, ब्रह्म (म्यांमार), बंगाल और मद्रास आदि स्थानों को चिह्नित किया जा सकता है।

मानचित्र मार्गदर्शिका (Map Guide):

झाँसी – उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में।

कानपुर और बिठूर – उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के किनारे।

मेरठ – पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, दिल्ली के निकट।

लखनऊ – उत्तर प्रदेश की राजधानी।

दिल्ली – भारत के उत्तर-मध्य भाग में स्थित राष्ट्रीय राजधानी।

पटना – बिहार की राजधानी।

ग्वालियर – मध्य प्रदेश के उत्तरी भाग में।

जबलपुर – मध्य प्रदेश के मध्य-पूर्वी क्षेत्र में।

नागपुर और सतारा – महाराष्ट्र के प्रमुख ऐतिहासिक नगर।

कोल्हापुर – महाराष्ट्र के दक्षिणी भाग में।

उदयपुर – राजस्थान के दक्षिणी भाग में।

तंजोर (तंजावुर) – तमिलनाडु में स्थित ऐतिहासिक नगर।

कर्नाटक – दक्षिण भारत का प्रमुख राज्य क्षेत्र।

सिंध और पंजाब – भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र से संबंधित ऐतिहासिक प्रदेश।

बंगाल और मद्रास – ब्रिटिश शासन के महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र।

ब्रह्म (म्यांमार) – भारत के पूर्व में स्थित क्षेत्र, जिसका उल्लेख कविता में किया गया है।

कक्षा 9 हिंदी (गंगा) अध्याय 11 – झाँसी की रानी (कविताओं के पदों की व्याख्या)

काव्य अंश 1

सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी (भौहें/गुस्सा) तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी, गुमी (खोई) हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फ़िरंगी (अंग्रेज) को करने की सबने मन में ठानी थी, चमक उठी सन् सत्तावन (1857 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम) में वह तलवार पुरानी थी। बुंदेले हरबोलों (बुंदेलखंड के लोकगायक) के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी (पुरुषों जैसी वीरता वाली) वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान जी ने सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि, भारतीय राजाओं के सुलगते आक्रोश और गुलामी के अंधकार से जाग रहे संपूर्ण भारतवर्ष में आई नई चेतना का अत्यंत ओजपूर्ण वर्णन किया है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचारों से दुखी होकर जब भारतीय राजवंशों ने गुस्सा किया, तो ब्रिटिश साम्राज्य के सिंहासन हिल गए। सौ साल की गुलामी से जर्जर और बूढ़ा हो चुका भारत पूरी तरह निराश था, लेकिन इस विद्रोह से देशवासियों में आज़ादी पाने का एक नया युवा जोश दौड़ गया। सबने अपनी खोई स्वतंत्रता की कीमत पहचानी और फिरंगियों को देश से खदेड़ने का संकल्प लिया, जिससे सन् सत्तावन में भारत की पुरानी तलवार बिजली की तरह चमक उठी। बुंदेलखंड के लोकगायकों के मुख से हमने यही सुना है कि पुरुषों के समान वीरता से लड़ने वाली वह योद्धा झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं।

काव्य अंश 2

कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ (तेजस्वी/सुंदर) थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण (तलवार), कटारी उसकी यही सहेली थी, वीर शिवाजी की गाथाएँ (कहानियाँ) उसको याद ज़बानी थीं। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के बचपन, उनके नाम, कानपुर के पेशवा परिवार के साथ उनके पारिवारिक संबंधों और उनकी शस्त्र-प्रिय दिनचर्या का सजीव चित्रण किया गया है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि लक्ष्मीबाई अपने पिता की एकमात्र संतान थीं और कानपुर के नाना साहब की मुँहबोली बहन थीं, जो अपने तेजस्वी स्वभाव के कारण ‘छबीली’ कहलाती थीं। उनका बचपन आम लड़कियों की तरह गुड़ियों से खेलते हुए नहीं, बल्कि नाना साहब के साथ पढ़ते और अस्त्र-शस्त्र चलाते हुए बीता था। बरछी, ढाल, तलवार और कटारी ही उनकी बचपन की असली सहेलियाँ थीं। उन्हें वीर शिवाजी महाराज के शौर्य की कहानियाँ मुँह-ज़बानी याद थीं, जिन्होंने उनके भीतर कूट-कूटकर देशभक्ति भर दी थी। बुंदेलखंड के लोकगायक हमेशा उनकी इसी वीरता का गान करते हैं।

काव्य अंश 3

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित (प्रसन्न) होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध, व्यूह (सेना की रचना) की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य (सेना) घेरना, दुर्ग (किले) तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,

भाव: इन पंक्तियों में लक्ष्मीबाई के युद्ध-कौशल, उनकी अदम्य युद्ध कलाओं और उनके असाधारण पराक्रम को देखकर मराठा साम्राज्य में छाई प्रसन्नता का वर्णन किया गया है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि लक्ष्मीबाई को देखकर ऐसा लगता था मानो वे स्वयं साक्षात् धन की देवी लक्ष्मी या शत्रुओं का संहार करने वाली माँ दुर्गा हैं, जो वीरता का अवतार लेकर धरती पर आई हैं। जब वे अभ्यास में अपनी तलवार चलाती थीं, तो उनके सटीक वार देखकर मराठा सैनिक खुशी से झूम उठते थे। उनके बचपन के खेल भी अद्भुत थे; उन्हें नकली युद्ध करना, चक्रव्यूह की रचना करना, जंगलों में शिकार खेलना, दुश्मन की सेना को घेरना और मिट्टी के किले तोड़ना बेहद पसंद था। यही सारे युद्ध-कौशल उनके सबसे प्रिय खिलौने थे।

काव्य अंश 4

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य (पूजा करने योग्य) भवानी थी। बुंदेले हरबोलों (बुंदेलखंड के लोकगायक) के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी (पुरुषों जैसी वीरता वाली) वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में लक्ष्मीबाई की धार्मिक निष्ठा और छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह ही माँ भवानी के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या: कवयित्री स्पष्ट करती हैं कि जिस प्रकार मराठा साम्राज्य के गौरव वीर छत्रपति शिवाजी महाराज अपनी कुलदेवी माँ भवानी की आराधना करते थे, ठीक उसी प्रकार रानी लक्ष्मीबाई भी माँ दुर्गा को अपनी आराध्य देवी मानती थीं। वे प्रतिदिन माँ भवानी की पूजा करती थीं और उन्हीं की कृपा से रानी के भीतर अदम्य शक्ति और वीरता का संचार होता था। बुंदेलखंड के लोकगायकों के मुख से हमने यही गौरव गाथा सुनी है कि युद्ध के मैदान में पुरुषों के समान साहस दिखाकर अद्भुत युद्ध लड़ने वाली वह महान वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ही थीं।

काव्य अंश 5

हुई वीरता की वैभव (ऐश्वर्य/धन) के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाईं झाँसी में, सुभट (रणकुशल योद्धा) बुंदेलों की विरुदावलि-सी (यशगान की कविता) वह आई झाँसी में, चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में रानी लक्ष्मीबाई के झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुए ऐतिहासिक विवाह, राजमहल के आनंदमय माहौल और झाँसी राज्य के गौरव में हुई वृद्धि का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि साक्षात् वीरता की प्रतिमूर्ति लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के वैभवशाली राजा गंगाधर राव के साथ संपन्न हुआ, मानो वीरता का मिलन वैभव से हो गया हो। उनके रानी बनकर झाँसी आने पर महलों में बधाई के गीत गूंज उठे और चारों तरफ खुशियाँ छा गईं। उनका आगमन ऐसा था जैसे वे बुंदेलखंड के योद्धाओं के यश की कीर्ति-गाथा बनकर आई हों। इस सुंदर जोड़ी को देखकर ऐसा लगता था मानो चित्रा ने वीर अर्जुन को पा लिया हो या भगवान शिव से माता भवानी का मिलन हो गया हो।

काव्य अंश 6

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित (प्रसन्न) महलों में उजयाली छाई, किंतु कालगति (समय का चक्र) चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, तीर चलाने वाले कर (हाथ) में उसे चूड़ियाँ कब भाईं, रानी विधवा हुई हाय! विधि (विधाता) को भी नहीं दया आई, निःसंतान (बिना संतान के) मरे राजाजी रानी शोक-समानी (शोक में डूबी) थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में झाँसी राज्य के सुखद दिनों के अचानक समाप्त होने, राजा गंगाधर राव की आकस्मिक मृत्यु और अल्पायु में ही रानी पर टूटे दुखों के पहाड़ की अत्यंत कारुणिक अभिव्यक्ति की गई है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि विवाह के बाद झाँसी का सौभाग्य जाग उठा और महलों में प्रसन्नता का उजाला छा गया, परंतु समय का क्रूर चक्र बहुत खामोशी से झाँसी पर संकट के काले बादल घेर लाया। विधाता को रानी के वे हाथ बिल्कुल अच्छे नहीं लगे जो चूड़ियाँ पहनने के बजाय तीर-कमान चलाने के लिए बने थे। राजा गंगाधर राव अचानक बीमार होकर बिना किसी संतान के असमय ही मृत्यु को प्राप्त हो गए, जिससे रानी छोटी उम्र में विधवा हो गईं और गहरे शोक के सागर में डूब गईं।

काव्य अंश 7

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया, राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, फौरन फौजें भेज दुर्ग (किले) पर अपना झंडा फहराया, लावारिस का वारिस (उत्तराधिकारी) बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया, अश्रुपूर्ण (आँसुओं से भरी) रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी (पराई/उजाड़) थी। बुंदेले हरबोलों (बुंदेलखंड के लोकगायक) के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी (पुरुषों जैसी वीरता वाली) वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में राजा गंगाधर राव के निधन के बाद क्रूर अंग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की कुटिल खुशी, झाँसी को हड़पने के उसके सैन्य प्रयास और असहाय रानी लक्ष्मीबाई के गहरे मानसिक दुख का वर्णन किया गया है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि जब झाँसी के राजा की मृत्यु के साथ वहां का रक्षक रूपी दीपक बुझ गया, तब क्रूर लॉर्ड डलहौजी मन में बहुत खुश हुआ। उसने अपनी ‘हड़प नीति’ के तहत इस अनाथ राज्य को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का यह सुनहरा मौका समझा। उसने तुरंत अपनी सेना भेजकर झाँसी के किले पर जबरन कब्जा किया और ब्रिटिश झंडा फहरा दिया। इस प्रकार लावारिस झाँसी का मालिक बनकर ब्रिटिश शासन वहां बैठ गया। आंखों में आंसू भरे असहाय रानी ने देखा कि उनकी हरी-भरी झाँसी आज पूरी तरह उजाड़ हो चुकी थी।

काव्य अंश 8

अनुनय-विनय (प्रार्थना/विनती) नहीं सुनता है, विकट (भयानक) फ़िरंगी (अंग्रेज) की माया, व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, डलहौजी ने पैर पसारे (साम्राज्य फैलाना) अब तो पलट गई काया (परिस्थिति बदलना), राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया, रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में अंग्रेजों की शुरुआत की लाचारी और बाद में सत्ता पाकर उनके द्वारा किए गए विश्वासघात तथा भारतीय राजाओं-रानियों की दयनीय स्थिति पर तीखा प्रहार किया गया है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि ये भयानक अंग्रेज इतने निर्दयी थे कि वे रानी की कोई भी प्रार्थना सुनने को तैयार नहीं थे। जब ये भारत आए थे, तब साधारण व्यापारी बनकर यहाँ के राजाओं से व्यापार करने की भीख और दया मांगते थे। परंतु सत्ता हाथ में आते ही डलहौजी ने पूरे देश में अपने साम्राज्य के पैर पसार लिए और पूरी परिस्थिति पलट दी। जिन राजाओं ने इन्हें शरण दी, आज उन्हीं को पैरों तले रौंद दिया। भारत की रानियाँ आज दासियों जैसी असहाय हो गईं और विदेशी दास यहाँ के राजा बन बैठे।

काव्य अंश 9

छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात, कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात (हमला/नुकसान), उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात (हैसियत/औकात), जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म (म्यांमार) पर अभी हुआ था वज्र-निपात (भारी वज्रपात/विनाश), बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में 1857 के समय संपूर्ण भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों और रियासतों पर अंग्रेजों द्वारा किए गए दमनकारी कब्ज़े और ब्रिटिश साम्राज्य के भयानक विस्तार का ऐतिहासिक चित्रण है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि अंग्रेजों का अत्याचार केवल झाँसी तक सीमित नहीं था। उन्होंने देश की मुख्य राजधानी दिल्ली को छीन लिया और लखनऊ पर देखते ही देखते कपट से अधिकार कर लिया। पेशवा को बिठूर में कैद कर दिया गया और नागपुर जैसी बड़ी रियासत पर हमला करके उसे नुकसान पहुँचाया। जब इतने बड़े राज्य नहीं टिक पाए, तो उदयपुर, तंजौर, सतारा और कर्नाटक जैसों की क्या हैसियत थी। सिंध, पंजाब और म्यांमार पर भी विनाश का वज्र गिरा था और बंगाल तथा मद्रास की भी यही दर्दनाक कहानी थी।

काव्य अंश 10

रानी रोईं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेजार (दुखी/ऊबा हुआ), उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार, सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार, ‘नागपूर के जेवर ले लो ‘लखनऊ के लो नौलख हार’, यों परदे की इज़्ज़त पर-देशी (विदेशी) के हाथ बिकानी थी। बुंदेले हरबोलों (बुंदेलखंड के लोकगायक) के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी (पुरुषों जैसी वीरता वाली) वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में अंग्रेजों द्वारा भारतीय राजघरानों की स्त्रियों पर किए गए अत्याचारों, उनके बहुमूल्य आभूषणों की सरेआम नीलामी और देश की अस्मत को विदेशी हाथों में बेचे जाने के घोर अपमान का कारुणिक चित्रण है।

व्याख्या: कवयित्री अंग्रेजों की घृणित सोच को उजागर करते हुए कहती हैं कि राज्य छिन जाने के गम में रानियाँ और नवाबों की बेगम अपने महलों में बहुत दुखी होकर रो रही थीं। अंग्रेज उनके बहुमूल्य वस्त्र और नौलखे हार जबरन छीनकर कलकत्ता के बाजारों में सरेआम बेच रहे थे। ब्रिटिश अखबारों में खुलेआम विज्ञापन छपते थे कि नागपुर के शाही जेवर और लखनऊ के नौलख हार खरीद लो। इस प्रकार जो भारतीय स्त्रियाँ हमेशा आदरपूर्वक परदे में रहती थीं, उनकी इज्जत को अंग्रेज विदेशियों के हाथों नीलाम कर रहे थे।

काव्य अंश 11

कुटियों में थी विषम (कठिन) वेदना, महलों में आहत (चोट खाया हुआ) अपमान, वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों (पूर्वजों) का अभिमान, नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, बहिन छबीली (लक्ष्मीबाई) ने रण-चंडी (युद्ध की देवी) का कर दिया प्रकट आह्वान (पुकार/घोषणा), हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में समाज के हर वर्ग के भीतर व्याप्त असंतोष, पूर्वजों के स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प और कानपुर के पेशवा परिवार द्वारा रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर युद्ध की तैयारियों का ओजपूर्ण वर्णन है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि अंग्रेजों के कुशासन से गरीब अपनी कुटियों में कठिन वेदना झेल रहे थे और राजा अपने महलों में अपमान से आहत थे। इस परिस्थिति में भी भारतीय वीर सैनिकों के दिलों में अपने पूर्वजों का स्वाभिमान जीवित था। कानपुर के नाना धुंधूपंत पेशवा अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के लिए युद्ध का सारा सामान गुप्त रूप से जुटा रहे थे, तभी उनकी साहसी बहन लक्ष्मीबाई ने साक्षात् रणचंडी का रूप धारण कर युद्ध की घोषणा कर दी। यह स्वतंत्रता का पवित्र महायज्ञ लोगों में सोई देशभक्ति जगाने के लिए था।

काव्य अंश 12

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम (हृदय की गहराई) से आई थी, झाँसी चेती (जागी), दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं, मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी, जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में सन् 1857 की क्रांति के जन-आंदोलन में बदलने, समाज के सभी अमीर-गरीब वर्गों की एकजुटता और देश के विभिन्न प्रमुख शहरों में फैली विद्रोह की आग का ऐतिहासिक वर्णन है।

व्याख्या: कवयित्री स्पष्ट करती हैं कि आज़ादी की यह लड़ाई पूरे भारत का सामूहिक जन-विद्रोह था। जब विद्रोह शुरू हुआ तो महलों के शासकों ने क्रांति की आग दी और झोंपड़ियों के आम नागरिकों ने उसे भयानक ज्वाला के रूप में सुलगा दिया। आज़ादी की यह चिनगारी हर भारतीय के हृदय की गहराई से निकली थी। देखते ही देखते झाँसी, दिल्ली और लखनऊ में विद्रोह की लपटें छा गईं। मेरठ, कानपुर और पटना के लोगों ने भारी धूम मचा रखी थी तथा जबलपुर और कोल्हापुर में भी अंग्रेजों के खिलाफ तीव्र हलचल पैदा हो चुकी थी।

काव्य अंश 13

इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम, भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम, लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी। बुंदेले हरबोलों (बुंदेलखंड के लोकगायक) के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी (पुरुषों जैसी वीरता वाली) वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शूरवीरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई है और अंग्रेजों की दमनकारी दृष्टि को उजागर किया गया है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि देश को आज़ाद कराने के इस महान महायज्ञ में भारत भूमि के कई श्रेष्ठ वीर शहीद हो गए। इन महान क्रांतिकारियों में नाना धुंधूपंत पेशवा, ताँतिया टोपे, चतुर अज़ीमुल्ला खान, अवध के अहमद शाह मौलवी और बिहार के परम प्रतापी वीर सैनिक ठाकुर कुँवरसिंह जैसे नाम शामिल हैं। इन सभी महान सपूतों के नाम भारत के इतिहास रूपी आकाश में हमेशा अमर रहेंगे। परंतु उस समय की क्रूर अंग्रेजी हुकूमत की नज़र में इन देशभक्तों द्वारा मातृभूमि के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान एक भयानक अपराध यानी ‘जुर्म’ कहलाता था।

काव्य अंश 14

इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में, जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में, लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में, रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व (युद्ध) असमानों में, जख्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में झाँसी की रणभूमि में रानी लक्ष्मीबाई और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट वॉकर के बीच हुए भीषण असमान युद्ध और रानी के हाथों पराजित होकर वॉकर के भागने का अत्यंत सजीव वर्णन है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि अब हम सीधे झाँसी के युद्ध मैदान की ओर चलते हैं, जहाँ रानी लक्ष्मीबाई शत्रुओं का संहार करने के लिए पुरुषों के बीच स्वयं एक वीर मर्द की तरह खड़ी हैं। इसी दौरान ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट वॉकर अपने जवानों को लेकर आगे बढ़ा। उसे सामने देखकर वीर रानी ने तुरंत अपनी तलवार खींच ली और दो असमान योद्धाओं के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी तलवार के प्रहारों से वॉकर को ऐसा जख्मी किया कि वह अजब हैरानी में अपनी जान बचाकर वहां से भाग खड़ा हुआ।

काव्य अंश 15

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर (लगातार) पार घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार, यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार, विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,

भाव: इन पंक्तियों में रानी लक्ष्मीबाई के निरंतर कठिन सफर, उनके प्रिय घोड़े के बलिदान, यमुना के तट पर अंग्रेजों की करारी हार और ग्वालियर पर रानी के ऐतिहासिक अधिकार का शौर्यपूर्ण चित्रण है।

व्याख्या: कवयित्री रानी के विजय अभियान का वर्णन करते हुए कहती हैं कि लेफ्टिनेंट वॉकर को हराने के बाद रानी लक्ष्मीबाई लगातार घोड़े पर सवार होकर सौ मील की लंबी दूरी पार करके कालपी पहुँच गईं। परंतु अत्यधिक थकान के कारण उनका वफादार घोड़ा अचानक जमीन पर गिर पड़ा और तुरंत स्वर्ग सिधार गया। इसके बाद कालपी में यमुना नदी के तट पर अंग्रेजी सेना ने फिर हमला किया, लेकिन पराक्रमी रानी ने अंग्रेजों को दोबारा करारी शिकस्त दी और विजयी होकर आगे बढ़ते हुए ग्वालियर पर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया।

काव्य अंश 16

अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी। बुंदेले हरबोलों (बुंदेलखंड के लोकगायक) के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी (पुरुषों जैसी वीरता वाली) वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में अंग्रेजों के चाटुकार और मित्र रहे ग्वालियर के राजा सिंधिया के डरकर भागने और रानी द्वारा ग्वालियर पर पूर्ण अधिकार करने की घटना को रेखांकित किया गया है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि ग्वालियर के राजा सिंधिया, जो अपनी देशभक्ति को भूलकर अंग्रेजों के परम मित्र और वफादार बने हुए थे, वे रानी लक्ष्मीबाई के इस भयानक आक्रमण को सहन नहीं कर पाए। रानी के अदम्य साहस और उनकी सेना के पराक्रम के सामने सिंधिया के पैर पूरी तरह उखड़ गए और वे डर के मारे अपनी राजधानी ग्वालियर को छोड़कर वहां से भाग खड़े हुए। इस प्रकार वीरांगना रानी ने बिना किसी संकोच के अंग्रेजों के इस सबसे मजबूत गढ़ पर अपना विजय पताका फहरा दिया।

काव्य अंश 17

विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी, अबके जनरल स्मिथ सन्मुख (सामने) था, उसने मुँह की खाई थी, काना और मंदरा सखियाँ (सहेलियाँ) रानी के सँग आई थीं, युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी, पर, पीछे ह्यू रोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में जनरल स्मिथ पर रानी और उनकी सहेलियों की विजय, रणभूमि में उनके पराक्रम और पीछे से आकर जनरल ह्यू रोज़ द्वारा रानी को कपट से घेरने का वर्णन है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि ग्वालियर की विजय के बाद अंग्रेजों की एक नई विशाल सेना ने रानी को दोबारा घेर लिया। इस बार सामने खड़े ब्रिटिश अधिकारी जनरल स्मिथ को भी रानी के हाथों पराजित होकर ‘मुँह की खानी’ पड़ी। इस संग्राम में रानी के साथ उनकी दो बहादुर सहेलियाँ काना और मंदरा भी आई थीं, जिन्होंने तलवारबाजी से अंग्रेजी सैनिकों में भारी मार मचाई। परंतु जैसे ही रानी आगे बढ़ीं, तभी अचानक पीछे से जनरल ह्यू रोज़ अपनी सेना लेकर आ गया और हाय! अब वीर रानी चारों तरफ से घिर चुकी थीं।

काव्य अंश 18

तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य (सेना) के पार, किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम (कठिन) अपार, घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार, रानी एक, शत्रु बहुतेरे (बहुत सारे), होने लगे वार पर वार, घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति (युद्ध में गौरवशाली मृत्यु) पानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में चारों तरफ से घिर जाने के बाद भी रानी के पराक्रम, एक अनजान नाले के कारण नए घोड़े के अड़ जाने के संकट और अंततः शत्रुओं के वार से आहत होकर सिंहनी रूपी रानी के वीरगति पाने का अत्यंत कारुणिक और गौरवशाली चित्रण है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि चारों तरफ से घिरने के बाद भी रानी हौसला नहीं हारीं और दुश्मनों को काटती हुई सेना के पार निकल गईं। परंतु अचानक सामने एक बहुत बड़ा बरसाती नाला आ गया, जो एक कठिन संकट था। नया घोड़ा होने के कारण वह वहीं अड़ गया। इतने में पीछा करते हुए ब्रिटिश घुड़सवार सैनिक आ पहुँचे। रानी अकेली थीं और शत्रु बहुत सारे थे, जिन्होंने रानी पर ताबड़तोड़ वार किए। सिंहनी की तरह लड़ने वाली वह महान वीरांगना घायल होकर धरती पर गिर पड़ी और वीरगति को प्राप्त हुईं।

काव्य अंश 19

रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज (मनुष्य) नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी, दिखा गई पथ (रास्ता), सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी। बुंदेले हरबोलों (बुंदेलखंड के लोकगायक) के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी (पुरुषों जैसी वीरता वाली) वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: इन पंक्तियों में रानी लक्ष्मीबाई के भौतिक शरीर के अंत, उनकी आत्मा के परमात्मा में विलीन होने और मात्र तेइस वर्ष की आयु में पूरे देश को आज़ादी का मार्ग दिखाने वाले उनके ईश्वरीय स्वरूप का ओजपूर्ण वर्णन है।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि वीर रानी सर्वोच्च बलिदान देकर स्वर्ग सिधार गईं और अब चिता ही उनकी दिव्य सवारी थी। उनका शारीरिक तेज अग्नि के तेज में विलीन हो गया, जिसकी वे सच्ची अधिकारी थीं। शहीद होते समय उनकी उम्र मात्र तेइस वर्ष की थी; वे साधारण मनुष्य नहीं बल्कि साक्षात् ईश्वरीय अवतार थीं। वे गुलामी से मृतप्राय हो चुके भारतवासियों में चेतना फूंककर हमें जीवित करने आई स्वतंत्रता की देवी थीं, जो हमें आज़ादी का रास्ता और अन्याय से लड़ने की सीख दे गईं।

काव्य अंश 20

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ (उपकार मानने वाले) भारत वासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी (कभी नष्ट न होने वाली), होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी, तेरा स्मारक (यादगार) तू ही होगी, तू खुद अमित (न मिटने वाली) निशानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

भाव: यह इस अमर कविता का अंतिम उपसंहार है, जिसमें संपूर्ण भारत राष्ट्र की ओर से रानी के प्रति कृतज्ञता प्रकट की गई है और यह घोषणा की गई है कि उनका नाम और स्मारक किसी पत्थर का मोहताज नहीं है, बल्कि वे स्वयं अपनी एक कभी न मिटने वाली पहचान हैं।

व्याख्या: कवयित्री संपूर्ण देशवासियों की तरफ से रानी को श्रद्धांजलि देते हुए कहती हैं कि हे रानी! हम सभी कृतज्ञ भारतवासी आपके इस सर्वोच्च बलिदान को हमेशा याद रखेंगे। आपका यह त्याग देश में कभी नष्ट न होने वाली स्वतंत्रता की भावना जगाएगा। भविष्य में चाहे इतिहास चुप हो जाए, सच्चाई को फाँसी लग जाए या अंग्रेज तोपों से पूरी झाँसी का नामोनिशान मिटा दें, लेकिन आपका गौरव कम नहीं होगा। महलों में आपका कोई स्मारक बने या न बने, आप स्वयं अपना स्मारक हैं क्योंकि आप स्वयं एक कभी न मिटने वाली अमित निशानी हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न और उत्तर (Very Short Questions and Answers)

प्रश्न 1: ‘झाँसी की रानी’ कविता की कवयित्री का क्या नाम है?

उत्तर: इस ओजपूर्ण और प्रसिद्ध कविता की रचना महान कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान जी ने की है, जिन्होंने वीरों के बलिदान को अमर बनाया है।

प्रश्न 2: कविता में ‘बूढ़े भारत’ शब्द का प्रयोग क्यों किया गया है?

उत्तर: सदियों की गुलामी, निराशा और दमनकारी ब्रिटिश नीतियों के कारण भारत पूरी तरह कमजोर और हताश हो चुका था, इसलिए उसे बूढ़ा कहा गया।

प्रश्न 3: रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का क्या नाम था और वे कहाँ रहती थीं?

उत्तर: लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम ‘छबीली’ था और उनका पूरा बचपन कानपुर के बिठूर में नाना साहब के साथ खेलते हुए बीता था।

प्रश्न 4: लक्ष्मीबाई की बचपन की सबसे प्रिय सहेलियाँ कौन सी थीं?

उत्तर: सामान्य खिलौनों के बजाय लक्ष्मीबाई को बचपन से ही बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी जैसे भयानक अस्त्र-शस्त्रों से खेलना बेहद पसंद था।

प्रश्न 5: लक्ष्मीबाई को किन महापुरुषों की वीरगाथाएँ मुँह-ज़बानी याद थीं?

उत्तर: लक्ष्मीबाई को महाराष्ट्र के गौरवशाली और पराक्रमी राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य और बलिदान की सारी कहानियाँ ज़बानी याद थीं।

प्रश्न 6: लक्ष्मीबाई के पसंदीदा बचपन के खेल कौन से थे?

उत्तर: उनके प्रिय खेल नकली युद्ध करना, चक्रव्यूह की रचना करना, जंगलों में शिकार खेलना और मिट्टी के मजबूत किलों को तोड़ना थे।

प्रश्न 7: रानी लक्ष्मीबाई का विवाह किसके साथ संपन्न हुआ था?

उत्तर: लक्ष्मीबाई का ऐतिहासिक विवाह झाँसी के परम प्रतापी और अत्यंत वैभवशाली राजा गंगाधर राव के साथ बहुत ही धूमधाम से हुआ था।

प्रश्न 8: कवयित्री ने रानी और राजा की जोड़ी की तुलना किससे की है?

उत्तर: कवयित्री ने उनकी जोड़ी की तुलना महाभारत काल के चित्रा और अर्जुन से तथा भगवान शिव और माता भवानी के अलौकिक मिलन से की है।

प्रश्न 9: झाँसी का सौभाग्य अचानक किस गहरे दुख में बदल गया?

उत्तर: राजा गंगाधर राव के असमय और निःसंतान निधन के कारण रानी लक्ष्मीबाई अत्यंत छोटी उम्र में विधवा हो गईं और झाँसी शोक में डूब गई।

प्रश्न 10: राजा की मृत्यु की खबर सुनकर लॉर्ड डलहौजी क्यों खुश हुआ?

उत्तर: डलहौजी अपनी कुटिल ‘हड़प नीति’ के तहत झाँसी को लावारिस मानकर उसे ब्रिटिश साम्राज्य में जबरन मिलाने का सुनहरा मौका पाकर खुश हुआ।

प्रश्न 11: ‘व्यापारी बन दया चाहता था’ पंक्ति का क्या अर्थ है?

उत्तर: इसका अर्थ है कि अंग्रेज शुरुआत में भारत में केवल सीधे-साधे व्यापारी बनकर आए थे और यहाँ के राजाओं से भीख मांगते थे।

प्रश्न 12: नाना धुंधूपंत और लक्ष्मीबाई ने युद्ध के लिए क्या कदम उठाया?

उत्तर: नाना साहब ने विद्रोह के लिए गुप्त रूप से हथियार और रसद जुटाए, वहीं लक्ष्मीबाई ने रणचंडी बनकर खुलेआम युद्ध का आह्वान किया।

प्रश्न 13: कविता में किन प्रमुख क्रांतिकारी वीरों के नाम आए हैं?

उत्तर: कविता में मुख्य रूप से नाना धुंधूपंत, ताँतिया टोपे, चतुर अज़ीमुल्ला खान, अहमद शाह मौलवी और ठाकुर कुँवरसिंह के नाम आए हैं।

प्रश्न 14: लेफ्टिनेंट वॉकर युद्ध के मैदान से क्यों भाग खड़ा हुआ?

उत्तर: झाँसी के मैदान में रानी लक्ष्मीबाई की तलवार के भयानक प्रहारों से वॉकर बुरी तरह जख्मी हो गया और डरकर भाग गया।

प्रश्न 15: अंत में रानी लक्ष्मीबाई की चिता को ‘दिव्य सवारी’ क्यों कहा गया?

उत्तर: क्योंकि रानी ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था और उनका पवित्र शारीरिक तेज अग्नि के अलौकिक तेज में विलीन हो गया था।

लघु उत्तरीय प्रश्न और उत्तर (Short Questions and Answer)

प्रश्न 1: “बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कवयित्री का तात्पर्य है कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी सहते-सहते संपूर्ण भारतवर्ष अत्यंत निराश, कमजोर और मृतप्राय हो चुका था। परंतु जैसे ही सन् 1857 में राजाओं और सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका, तो हताश हो चुके भारतीयों के दिलों में अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराने का एक नया युवा जोश और नया संकल्प दौड़ गया।

प्रश्न 2: लक्ष्मीबाई के बचपन और सामान्य लड़कियों के बचपन में क्या अंतर था?

उत्तर: सामान्य लड़कियाँ जहाँ बचपन में गुड़े-गुड़ियों, गहनों और साधारण खिलौनों से खेलती हैं, वहीं लक्ष्मीबाई का बचपन इन सबसे बिल्कुल अलग था। उनके प्रिय खिलौने बरछी, ढाल, तलवार और कटारी जैसे हथियार थे। वे बचपन से ही नकली युद्ध करने, चक्रव्यूह रचने और शिकार खेलने जैसे साहसिक सैन्य अभ्यासों में अपना समय बिताती थीं।

प्रश्न 3: झाँसी के राजा के निधन पर डलहौजी ने किस नीति का प्रयोग किया और क्यों?

उत्तर: झाँसी के राजा गंगाधर राव के निःसंतान मरने पर लॉर्ड डलहौजी ने अपनी कुटिल ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) का प्रयोग किया। इस क्रूर नियम के अनुसार, यदि कोई राजा बिना उत्तराधिकारी के मर जाता था, तो अंग्रेजों को उसका राज्य हड़पने का अधिकार मिल जाता था। डलहौजी ने तुरंत अपनी सेना भेजकर झाँसी पर कब्ज़ा कर लिया।

प्रश्न 4: अंग्रेजों ने भारतीय रानियों और बेगमों का किस प्रकार आर्थिक और मानसिक शोषण किया?

उत्तर: अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं को कुचलकर उनकी रानियों और नवाबों की बेगमों को महलों से बेदखल कर दिया। वे उनके बहुमूल्य वस्त्र, नौलखे हार और कीमती आभूषण जबरन छीनकर कलकत्ता के बाजारों में सरेआम नीलाम करते थे। ब्रिटिश अखबारों में इन नीलामियों के विज्ञापन खुलेआम छापे जाते थे, जो उन शाही स्त्रियों के सम्मान पर बहुत गहरी चोट थी।

प्रश्न 5: 1857 की क्रांति को एक सामूहिक जन-आंदोलन क्यों कहा गया है?

उत्तर: यह क्रांति किसी एक राजा या सैनिक तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें देश के अमीर और गरीब दोनों वर्गों ने समान रूप से भाग लिया था। महलों में रहने वाले राजाओं ने क्रांति की आग को हवा दी, तो झोंपड़ियों में रहने वाले देश के आम नागरिकों ने उस आग को एक भयानक जन-विद्रोह की ज्वाला में बदल दिया।

प्रश्न 6: कविता के आधार पर बताइए कि अंग्रेजों के भारत आने का असली क्रम क्या था?

उत्तर: अंग्रेज प्रारंभ में भारत की धरती पर बेहद सीधे, लाचार और साधारण व्यापारी बनकर कदम रखे थे। वे यहाँ के राजा-महाराजाओं के सामने हाथ जोड़कर व्यापार करने की अनुमति और दया की भीख मांगते थे। परंतु जैसे ही उन्हें राजनीतिक सत्ता मिली, लॉर्ड डलहौजी की कूटनीति के कारण उन्होंने पूरे देश में अपने पैर पसार लिए और राजाओं को ही ठुकरा दिया।

प्रश्न 7: कालपी के युद्ध मैदान में रानी लक्ष्मीबाई को किस भारी संकट का सामना करना पड़ा?

उत्तर: कालपी में यमुना नदी के तट पर अंग्रेजों को हराने के बाद रानी का वफादार और अनुभवी पुराना घोड़ा अत्यधिक थकान के कारण अचानक जमीन पर गिर पड़ा और तुरंत मर गया। रानी को एक नया और अप्रशिक्षित घोड़ा लेना पड़ा। जब वे आगे बढ़ीं, तो सामने एक अनजान बरसाती नाला आ गया, जहाँ वह नया घोड़ा अड़ गया।

प्रश्न 8: ग्वालियर के राजा सिंधिया की भूमिका 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में कैसी थी?

उत्तर: ग्वालियर के राजा सिंधिया अपनी देशभक्ति और मातृभूमि की मर्यादा को पूरी तरह भूलकर अंग्रेजों के परम मित्र और वफादार बने हुए थे। जब रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी सेना के साथ ग्वालियर पर तीव्र आक्रमण किया, तो सिंधिया रानी के शौर्य का सामना नहीं कर पाए और डर के मारे अपनी राजधानी छोड़कर अंग्रेजों के पास भाग खड़े हुए।

प्रश्न 9: जनरल स्मिथ और ह्यू रोज़ ने मिलकर रानी लक्ष्मीबाई को किस प्रकार घेरा?

उत्तर: ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई ने सामने से हमला करने वाले अंग्रेज अधिकारी जनरल स्मिथ को अपनी सहेलियों काना और मंदरा के साथ मिलकर बुरी तरह पराजित किया। परंतु जैसे ही वे विजयी होकर आगे बढ़ीं, तभी पीछे से चालाक सेनापति जनरल ह्यू रोज़ अपनी एक बहुत विशाल ताज़ा सेना लेकर आ धमका, जिससे रानी दोनों ओर से शत्रुओं से घिर गईं।

प्रश्न 10: कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के स्मारक को ‘अमित निशानी’ क्यों कहा है?

उत्तर: कवयित्री कहती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई की याद में दुनिया में पत्थरों का कोई स्मारक बने या न बने, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। उनका त्याग, उनका अदम्य साहस और देश के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान अपने आप में एक ऐसी कभी न मिटने वाली पहचान है, जिसे समय की धूल भी कभी धुंधला नहीं कर सकती।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और उत्तर (Long Questions and Answer)

प्रश्न 1: सुभद्रा कुमारी चौहान जी द्वारा रचित ‘झाँसी की रानी’ कविता का मूल प्रतिपाद्य और केंद्रीय भाव अपने शब्दों में विस्तार से लिखिए।

उत्तर: ‘झाँसी की रानी’ कविता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को ओजपूर्ण वाणी में प्रस्तुत करने वाली एक कालजयी रचना है। इस कविता का मूल प्रतिपाद्य देश के युवाओं और छात्रों के भीतर राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और वीरता की सोई हुई चेतना को जागृत करना है। कवयित्री ने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि जब देश पर विदेशी हुकूमत का संकट आता है, तो महलों से लेकर झोंपड़ियों तक किस प्रकार विद्रोह की ज्वाला सुलग उठती है।

इस कविता का केंद्रीय भाव वीरांगना लक्ष्मीबाई के त्याग, अदम्य साहस और उनके जीवन संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमता है। कविता हमें बताती है कि लक्ष्मीबाई केवल एक शासक नहीं थीं, बल्कि वे साक्षात् वीरता की अवतार थीं। उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले काल में भी हथियारों को अपना साथी बनाया और एक कुशल सेनापति की भांति अंग्रेजों की चक्रवर्ती सत्ता को हिलाकर रख दिया। कविता का मुख्य संदेश यह है कि स्वतंत्रता कभी भी भीख में नहीं मिलती, इसके लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करना पड़ता है। राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद जब झाँसी अनाथ हो गई, तब रानी ने हार मानने के बजाय संघर्ष का कठिन रास्ता चुना। उन्होंने देश के अन्य राजाओं और आम जनता को एकजुट करके 1857 की क्रांति को एक जन-आंदोलन का रूप दिया।

अंततः एक अनजान नाले के कारण घिर जाने पर भी वे सिंहनी की तरह लड़ती रहीं और वीरगति को प्राप्त हुईं। उनका यह बलिदान नष्ट न होने वाली आज़ादी की नींव बन गया, जो आज भी हर भारतवासी को राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।

प्रश्न 2: कविता के आधार पर रानी लक्ष्मीबाई के चरित्र की मुख्य विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डालिए।

उत्तर: कविता के गहन अध्ययन से रानी लक्ष्मीबाई के चरित्र की कई ऐसी अनूठी और प्रेरणादायक विशेषताएँ सामने आती हैं, जो उन्हें इतिहास का सबसे महान नायक बनाती हैं।

साहसिक एवं युद्धप्रिय स्वभाव:

उनकी पहली सबसे बड़ी विशेषता उनका बचपन से ही साहसिक और अस्त्र-शस्त्र प्रिय होना है। जहाँ सामान्य बालिकाएँ गुड़ियों और आभूषणों में मन लगाती थीं, वहीं लक्ष्मीबाई ने बरछी, ढाल और तलवार को अपनी सहेली बनाया। वे नकली युद्ध करने और चक्रव्यूह रचने में माहिर थीं, जो उनके भविष्य के सैन्य नेतृत्व की नींव थी।

अद्वितीय साहस और स्वाभिमान:

उनकी दूसरी विशेषता उनका अद्वितीय साहस और स्वाभिमान है। पति के निधन के बाद जब डलहौजी ने झाँसी पर कब्ज़ा किया, तो रानी ने दासी बनना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने के बजाय युद्ध के मैदान में उतरने का साहसिक निर्णय लिया। वे रणभूमि में साक्षात् दुर्गा और रणचंडी बनकर प्रकट होती थीं, जिनके वार देखकर मराठे भी गर्व से भर जाते थे।

कुशल युद्ध-रणनीति और संगठन क्षमता:

उनकी तीसरी विशेषता उनकी कुशल युद्ध रणनीति और संगठन क्षमता है। उन्होंने न केवल अपनी सहेलियों काना और मंदरा को एक कुशल योद्धा बनाया, बल्कि देश के विभिन्न राजाओं जैसे नाना साहब, ताँतिया टोपे और आम जनता को अंग्रेजों के खिलाफ एक मंच पर खड़ा किया। कालपी से लेकर ग्वालियर तक उनके विजय अभियान उनकी उत्कृष्ट सैन्य कला के प्रमाण हैं।

राष्ट्रभक्ति और बलिदान की भावना:

उनकी अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी निस्वार्थ राष्ट्रभक्ति और बलिदान की भावना है। उन्होंने मात्र तेइस वर्ष की अल्पायु में अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। वे अंत समय तक अकेली होने पर भी सैकड़ों शत्रुओं से लोहा लेती रहीं। उनका चरित्र हर छात्र को यह सिखाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों ना हों, अपने स्वाभिमान और देश के गौरव के साथ कभी समझौता नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 3: सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का कविता के संदर्भ में विस्तृत वर्णन कीजिए।

उत्तर: सुभद्रा कुमारी चौहान जी ने इस कविता में केवल रानी लक्ष्मीबाई की कहानी नहीं लिखी है, बल्कि उन्होंने सन् 1857 के समय के संपूर्ण भारत के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य का एक बहुत ही सजीव ऐतिहासिक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया है।

राजनैतिक परिस्थितियाँ:

राजनैतिक रूप से उस समय भारत की स्थिति अत्यंत दयनीय और अस्थिर थी। अंग्रेज व्यापारी बनकर आए थे लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने कपट और कूटनीति से देश की सत्ता हथिया ली थी। लॉर्ड डलहौजी की क्रूर ‘हड़प नीति’ के कारण देश के राजाओं और नवाबों में भारी आक्रोश था। अंग्रेजों ने देश की मुख्य राजधानी दिल्ली छीन ली थी, लखनऊ को धोखे से हड़प लिया था और पेशवा को बिठूर में कैद कर दिया था। नागपुर, उदयपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक, सिंध और पंजाब जैसी तमाम समृद्ध रियासतें अंग्रेजों के दमनकारी चक्रव्यूह में फँसकर अपना अस्तित्व खो चुकी थीं। राजाओं की संप्रभुता को पैरों तले रौंद दिया गया था।

आर्थिक परिस्थितियाँ:

आर्थिक रूप से अंग्रेज भारत का भयंकर शोषण कर रहे थे। वे देश का सारा धन लूटकर कलकत्ता ले जा रहे थे। राजघरानों की संपत्ति और स्त्रियों के बहुमूल्य आभूषणों को सरेआम बाजारों में नीलाम किया जा रहा था, जिससे देश की आर्थिक रीढ़ पूरी तरह टूट चुकी थी। कुटियों में रहने वाली आम जनता भारी करों और भुखमरी के कारण कठिन वेदना झेल रही थी।

सामाजिक परिस्थितियाँ:

सामाजिक रूप से पूरे देश में अपमान और हताशा का माहौल था। महलों के शासक अपने अधिकारों के छिन जाने से आहत थे, तो वीर सैनिकों के मन में अपने पूर्वजों के गौरव की रक्षा करने की तीव्र छटपटाहट थी। समाज का हर वर्ग अंग्रेजों के इस कुशासन से पूरी तरह त्रस्त हो चुका था।

यही वह त्रिकोणीय असंतोष था जिसने महलों की आग और झोंपड़ियों की ज्वाला को एक साथ मिलाकर 1857 के उस महान जन-विद्रोह का रूप दिया, जिसने पहली बार ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को अंदर तक हिलाकर रख दिया था।

प्रश्न 4: झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम महासंग्राम का कविता की पंक्तियों के आलोक में विस्तृत और सजीव चित्रण कीजिए।

उत्तर: रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम महासंग्राम भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे गौरवशाली और कारुणिक अध्यायों में से एक है। ग्वालियर पर विजय प्राप्त करने के बाद जब अंग्रेजों के मित्र सिंधिया अपनी राजधानी छोड़कर भाग गए, तब रानी को एक क्षण की विजय तो मिली, परंतु शीघ्र ही अंग्रेजों की एक विशाल सेना ने उन्हें दोबारा घेर लिया।

इस अंतिम युद्ध की शुरुआत में रानी के सामने जनरल स्मिथ अपनी सेना लेकर खड़ा था। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी दो बहादुर सहेलियों, काना और मंदरा के साथ मिलकर युद्ध क्षेत्र में ऐसी भारी तबाही मचाई कि जनरल स्मिथ को मुँह की खानी पड़ी और वह बुरी तरह पराजित हुआ। परंतु जैसे ही रानी आगे बढ़ीं, पीछे से कपटी सेनापति जनरल ह्यू रोज़ अपनी एक बहुत बड़ी फ्रेश सेना लेकर आ पहुँचा। अब परिस्थिति अत्यंत विकट थी क्योंकि रानी दोनों ओर से घिर चुकी थीं। इसके बावजूद रानी ने हिम्मत नहीं हारी और वे मार-काट मचाती हुई, शत्रुओं की लाशों के ढेर लगाती हुई अंग्रेजी सेना को चीरकर सुरक्षित बाहर निकल गईं।

परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही रानी आगे बढ़ीं, सामने एक बहुत बड़ा बरसाती नाला आ गया। कालपी के मैदान में उनका पुराना वफादार घोड़ा पहले ही शहीद हो चुका था और यह उनका नया घोड़ा था जो अनजान नाले को देखकर वहीं अड़ गया। रानी अपने घोड़े को पार कराने का प्रयास कर ही रही थीं कि पीछा करते हुए ब्रिटिश घुड़सवार सैनिक वहां आ पहुँचे। युद्ध के मैदान का वह दृश्य हृदयविदारक था; देशभक्त रानी अकेली थीं और उन्हें घेरने वाले शत्रु सैनिक असंख्य थे। अंग्रेजों ने उन पर चारों तरफ से ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए। साक्षात् सिंहनी की तरह शत्रुओं का मर्दन करने वाली वह वीरांगना अंततः गहरे घावों के कारण लहूलुहान होकर धरती पर गिर पड़ी और वीरगति को प्राप्त हुई। उनका यह अंतिम संघर्ष अदम्य साहस की पराकाष्ठा है, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।

प्रश्न 5: “तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमित निशानी थी।” इस अंतिम पंक्ति के माध्यम से कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान क्या संदेश देना चाहती हैं और यह आज के छात्रों के लिए कैसे प्रासंगिक है?

उत्तर: कविता की यह अंतिम पंक्ति केवल लक्ष्मीबाई के प्रति एक श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि यह कीर्ति और अमरता के दर्शन को समझाने वाला एक बहुत बड़ा संदेश है। इस पंक्ति के माध्यम से कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान यह स्पष्ट करना चाहती हैं कि जो लोग देश और समाज के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं, उनका नाम और उनका अस्तित्व किसी ईंट-पत्थर, मिट्टी या सीमेंट से बने कृत्रिम स्मारकों का मोहताज नहीं होता।

अंग्रेज भले ही अपनी तोपों के गोलों से पूरी झाँसी नगरी का नामोनिशान मिटा दें या इतिहासकार अपनी किताबों में सच लिखने से कतराएं, परंतु रानी लक्ष्मीबाई का चरित्र, उनका अदम्य साहस और उनका महान बलिदान स्वयं में एक ऐसा अमर स्मारक है जिसे दुनिया की कोई भी ताकत कभी मिटा नहीं सकती। वे स्वयं अपनी एक कभी न मिटने वाली ‘अमित निशानी’ हैं, जो हर युग में लोगों के दिलों में धड़कती रहेगी।

आज के आधुनिक युग के छात्रों के लिए यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। आज के छात्र अक्सर बाहरी चकाचौंध, सोशल मीडिया के दिखावे और क्षणिक प्रसिद्धि के पीछे भागते हैं। रानी का यह चरित्र छात्रों को सिखाता है कि असली पहचान और सम्मान बाहरी स्मारकों या दिखावे से नहीं, बल्कि आपके द्वारा किए गए महान कार्यों, आपके निस्वार्थ चरित्र और समाज के प्रति आपके योगदान से मिलता है। यह पंक्ति छात्रों को यह सीख देती है कि उन्हें अपने जीवन में ऐसे उत्कृष्ट कार्य करने चाहिए और अपने भीतर ऐसा मजबूत चरित्र विकसित करना चाहिए कि उनका व्यक्तित्व स्वयं में एक मिसाल बन जाए।

झाँसी की रानी (लक्ष्मीबाई) – FAQs

प्रश्न 1: झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के बचपन के सबसे पसंदीदा खेल और खिलौने कौन से थे?

उत्तर: लक्ष्मीबाई के बचपन के खेल आम लड़कियों जैसे नहीं थे। उन्हें गुड़े-गुड़ियों के बजाय बरछी, ढाल और तलवार जैसे अस्त्र-शस्त्र चलाना, नकली युद्ध करना, चक्रव्यूह रचना और जंगलों में शिकार खेलना सबसे ज़्यादा पसंद था।

प्रश्न 2: राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद लॉर्ड डलहौजी क्यों खुश हुआ था?

उत्तर: राजा गंगाधर राव का निधन बिना किसी संतान के हुआ था। लॉर्ड डलहौजी अपनी कुटिल ‘हड़प नीति’ के तहत झाँसी को अनाथ मानकर उसे ब्रिटिश साम्राज्य में जबरन मिलाने का सुनहरा मौका पाकर मन ही मन बहुत खुश हुआ था।

प्रश्न 3: झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का विवाह किसके साथ हुआ था और उनकी जोड़ी कैसी थी?

उत्तर: लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ था। उनकी जोड़ी इतनी अद्भुत थी कि कवयित्री ने उसकी तुलना महाभारत काल के अर्जुन-चित्रा और भगवान शिव तथा माता भवानी के अलौकिक मिलन से की है।

प्रश्न 4: 1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों ने भारतीय राजघरानों की रानियों का अपमान कैसे किया?

उत्तर: अंग्रेजों ने भारतीय राज्यों को हड़पकर वहाँ की रानियों और बेगमों के बहुमूल्य वस्त्र तथा नौलखे हार जबरन छीन लिए थे। वे इन शाही आभूषणों को कलकत्ता के बाजारों में सरेआम नीलाम करते थे और अखबारों में विज्ञापन छापते थे।

प्रश्न 5: युद्ध के मैदान में रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु किस कारण से और कैसे हुई थी?

उत्तर: अंतिम युद्ध में रानी चारों तरफ से ब्रिटिश सेना से घिर गई थीं। भागते समय सामने एक अनजान बरसाती नाला आ गया, जहाँ उनका नया घोड़ा अड़ गया और शत्रुओं ने अकेली रानी पर ताबड़तोड़ वार कर उन्हें घायल कर दिया।

प्रश्न 6: सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर: इस अमर कविता की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान जी का जन्म 16 अगस्त 1904 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) जिले के निहालपुर गाँव में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था।

प्रश्न 7: 1857 की क्रांति के कितने साल बाद यह बहुचर्चित और प्रसिद्ध कविता लिखी गई थी?

उत्तर: यह प्रसिद्ध कविता 1857 की ऐतिहासिक क्रांति के लगभग 73 वर्ष बाद सन् 1930 के दशक में लिखी गई थी जब भारत में अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था।