In the Second Chapter of Class 9 Hindi Ganga (2026–27) Chapter 2 “क्या लिखूँ?” is written by Padumlal Punnalal Bakshi (पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी). In this essay, the writer thoughtfully explains the process of writing and the confusion a writer faces while selecting a topic. He discusses social issues, human thoughts and everyday experiences in a simple yet engaging style. The chapter highlights creativity, observation and meaningful expression. Through humour and reflective ideas, it encourages students to think deeply and express their views effectively. (क्या लिखूँ? – रचनात्मक सोच, सामाजिक मुद्दों, सूक्ष्म निरीक्षण और प्रभावशाली अभिव्यक्ति के महत्व को दर्शाता है, जो विद्यार्थियों को विचारशील और संवेदनशील बनने की प्रेरणा देता है।)
CBSE क्लास 9 हिंदी गंगा चैप्टर 2 “क्या लिखूँ?” का सॉल्यूशंस बोलो !
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
मेरे उत्तर मेरे तर्क – (पेज 35 के प्रश्न उत्तर)
1. “हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है… असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।” निबंध में ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है?
(क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना
(ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्री को प्रमुख बताना
(ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिता बताना
(घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखन का समर्थन करना
सही उत्तर: (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना।
उत्तर: लेखक के अनुसार निबंध के लिए विषय (खूँटी) मात्र एक आधार है, जबकि असली महत्व लेखक के अपने मौलिक विचारों और भावों (हैट) का होता है। एक कुशल लेखक किसी भी साधारण विषय पर अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ सकता है।
विस्तृत व्याख्या: इस उदाहरण के माध्यम से लेखक यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि निबंध लेखन में विषय का चयन उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उस विषय पर लेखक की अपनी मौलिक सोच और प्रस्तुतीकरण। जिस प्रकार हैट को टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है, उसी प्रकार एक प्रतिभाशाली निबंधकार किसी भी सामान्य विषय को आधार बनाकर अपने गंभीर और सुंदर भावों को व्यक्त कर सकता है। यहाँ ‘हैट’ लेखक के व्यक्तिगत विचारों और ‘खूँटी’ विषयवस्तु का प्रतीक है।
2. “उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है… उसका उल्लास रहता है।” मानटेन की पद्धित लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है?
(क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न देना
(ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना
(ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना
(घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
सही उत्तर: (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना।
उत्तर: मानटेन की पद्धति यह सिखाती है कि निबंध लेखक की सच्ची अनुभूतियों और उल्लास का दर्पण होना चाहिए। इसमें किसी बाहरी दबाव या नियमों के बजाय लेखक के अपने अनुभवों और स्वच्छंद विचारों को प्राथमिकता दी जाती है।
विस्तृत व्याख्या: मानटेन की पद्धति के अनुसार निबंध एक ऐसा माध्यम है जहाँ लेखक बिना किसी शास्त्रीय बंधन के अपने हृदय की बातों को पाठकों के सामने रखता है। इसमें विद्वत्ता प्रदर्शन के स्थान पर लेखक के निजी अनुभव, उसकी मानसिक स्थिति और विचारों की स्वतंत्रता को आधार बनाया जाता है। बख्शी जी इसी पद्धति का समर्थन करते हुए मानते हैं कि एक श्रेष्ठ निबंध वही है, जिसमें लेखक का अपना व्यक्तित्व और उसकी वास्तविक अनुभूतियाँ पूरी स्पष्टता के साथ झलकती हों।
3. “तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल… वृद्धों के लिए अतीत सुखद…” यह तुलना किस पर आधारित है?
(क) तर्क और भावना
(ख) ज्ञान और शिक्षा
(घ) अभिलाषा और अनुभव
(ग) परिश्रम और उपलब्धि
सही उत्तर: (घ) अभिलाषा और अनुभव।
उत्तर: तरुण अपनी भविष्य की मधुर अभिलाषाओं के कारण आने वाले समय को उज्ज्वल देखते हैं, जबकि वृद्ध अपने जीवन के अनुभवों के कारण बीते हुए सुखद अतीत को याद करते हैं। यह तुलना वर्तमान के प्रति दोनों के असंतोष को दर्शाती है।
विस्तृत व्याख्या: यह तुलना मानवीय मनोविज्ञान के दो अलग पड़ावों—अभिलाषा और अनुभव—पर आधारित है। युवा अपनी कल्पनाओं और आकांक्षाओं के सहारे भविष्य के सुनहरे सपने बुनते हैं, जिससे उन्हें आने वाला समय उज्ज्वल प्रतीत होता है। इसके विपरीत, वृद्धों के पास अनुभवों की पूँजी होती है और वे अपने अतीत की स्मृतियों में सुख ढूँढते हैं। लेखक बताते हैं कि इसी कारण तरुणों और वृद्धों, दोनों के लिए वर्तमान कष्टदायक होता है और वे सुधार की कामना करते हैं।
4. निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है?
(क) कविता लेखन की कला को समझाने के लिए
(ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए
(ग) ढोल के महत्व को दर्शाने के लिए
(घ) सामाजिक सुधार के उदाहरण के रूप में
सही उत्तर: (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए।
उत्तर: अमीर खुसरो की कहानी का उदाहरण निबंध लेखन की उस कठिन परिस्थिति को समझाने के लिए दिया गया है, जहाँ लेखक को एक ही समय में अलग-अलग और असंबद्ध विषयों को जोड़कर एक सुंदर रचना तैयार करनी पड़ती है।
विस्तृत व्याख्या: लेखक ने अमीर खुसरो का उदाहरण इसलिए दिया है ताकि वे यह बता सकें कि निबंध लिखना कभी-कभी कितना चुनौतीपूर्ण होता है। जिस प्रकार खुसरो ने खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल जैसे अलग-अलग विषयों को एक ही पहेली में पिरो दिया था, वैसे ही एक निबंधकार को भी समाज-सुधार और दूर के ढोल सुहावने जैसे भिन्न विषयों पर एक साथ विचार प्रकट करने पड़ते हैं। यह कहानी लेखक की बहुमुखी प्रतिभा और रचनात्मक कौशल को रेखांकित करने के लिए प्रयुक्त हुई है।
5. निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है?
(क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
(ख) सुधार केवल बड़े विचारकों द्वारा संभव हैं।
(ग) सुधार केवल आधुनिक युग की देन हैं।
(घ) सुधारों का कोई अंत नहीं, लेकिन दोष समाप्त हो जाते हैं।
सही उत्तर: (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
उत्तर: लेखक का मानना है कि संसार परिवर्तनशील है और प्रत्येक युग में नए दोष उत्पन्न होते रहते हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने के लिए सुधारों की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती और यह हर काल में अनिवार्य बनी रहती है।
विस्तृत व्याख्या: निबंध में समाज-सुधार को एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बताया गया है। लेखक के अनुसार, जो आज सुधार है, वह कल पुराना होकर एक दोष बन सकता है। समाज में समय के साथ नई बुराइयाँ आती रहती हैं, इसलिए उन्हें दूर करने के लिए नए सुधारकों की आवश्यकता हमेशा बनी रहेगी। यह विचार इस सत्य को पुष्ट करता है कि दोषों का अंत कभी स्थायी नहीं होता और मनुष्य को हर युग में उन्नति के लिए निरंतर प्रयासरत रहना पड़ता है।
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए –
मेरी समझ मेरे विचार – (पेज 36 के प्रश्न उत्तर)
1. निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?
उत्तर: ए.जी. गार्डिनर का मानना है कि निबंध के लिए विषय नहीं, बल्कि लेखक की मनोवृत्ति महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत, लेखक बख्शी जी निबंध की रचना प्रक्रिया को अधिक जटिल मानते हैं, जहाँ उन्हें विभिन्न विषयों के सामंजस्य में कठिनाई होती है।
विस्तृत व्याख्या: ए.जी. गार्डिनर निबंध लेखन को एक अत्यंत सहज और मानसिक स्वतंत्रता की प्रक्रिया मानते हैं। उनके अनुसार, विषय केवल एक बहाना (खूँटी) है, जिस पर लेखक अपने विचारों की हैट टाँगता है। लेखक को बस अपनी मानसिक स्थिति और उमंग को कागज़ पर उतारना होता है। इसके विपरीत, इस पाठ के लेखक को निबंध लिखने में विषय की सीमाएँ और विद्वानों के सिद्धांतों का बोझ महसूस होता है। लेखक को लगता है कि गार्डिनर की तरह किसी भी विषय पर लिखना इतना आसान नहीं है, विशेषकर तब जब विषय गंभीर और विशिष्ट हों।
2. लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर: तरुणों की असंतुष्टि का कारण भविष्य के उज्ज्वल सपने और वर्तमान की बाधाएं हैं, वे बदलाव चाहते हैं। वृद्धों की असंतुष्टि का कारण अतीत का मोह है, वे वर्तमान की तुलना अपने पुराने सुखद समय से करते हैं।
विस्तृत व्याख्या: तरुणों के पास भविष्य की मधुर अभिलाषाएं होती हैं और वे संसार में शीघ्रता से सुधार और प्रगति देखना चाहते हैं। जब वर्तमान की परिस्थितियाँ उनके सपनों के अनुकूल नहीं होतीं, तो वे असंतुष्ट होकर क्रांति और परिवर्तन की मांग करते हैं। दूसरी ओर, वृद्धों के पास अनुभवों का भंडार होता है और उन्हें अपना बीता हुआ कल सबसे सुखद लगता है। उन्हें वर्तमान की नई रीतियाँ और बदलाव स्वीकार नहीं होते, इसलिए वे अतीत के गौरव को वापस पाने की लालसा में वर्तमान को कोसते हैं। इस प्रकार, आशा और स्मृति दोनों ही वर्तमान को अप्रिय बना देती हैं।
3. निमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं?
उत्तर: निमिता ‘समाज-सुधार’ और अमिता ‘दूर के ढोल सुहावने’ विषय पर निबंध लिखवाना चाहती हैं। लेखक को कठिनाई यह थी कि उसे सीमित समय और शब्दों में दो अलग-अलग प्रवृत्तियों वाले विषयों पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत करने थे।
विस्तृत व्याख्या: निमिता को अपनी स्कूल की परीक्षा के लिए ‘समाज-सुधार’ पर निबंध चाहिए था, जबकि अमिता को ‘दूर के ढोल सुहावने’ विषय पर। लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि ये दोनों विषय अलग-अलग मानसिक स्थितियों की मांग करते थे। ‘समाज-सुधार’ एक गंभीर और तर्कपूर्ण विषय है, वहीं ‘दूर के ढोल सुहावने’ एक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक सत्य है। लेखक को लगा कि खुसरो की पहेली की तरह इन असंबद्ध विषयों को एक सूत्र में पिरोना असंभव है। साथ ही, विद्वानों के सिद्धांतों के अनुसार निबंध को ‘विद्वत्तापूर्ण’ बनाना उनके लिए एक भारी मानसिक दबाव बन गया था।
4. निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?
उत्तर: आचार्यों के अनुसार आदर्श निबंध संक्षिप्त, सुसंगठित, स्पष्ट और प्रभावशाली होना चाहिए। निबंध लिखने से पहले मैं विषय के मुख्य बिंदुओं को चुनता हूँ, उनकी रूपरेखा तैयार करता हूँ और फिर तार्किक ढंग से विचारों को क्रमबद्ध करता हूँ।
विस्तृत व्याख्या: निबंधशास्त्र के आचार्यों ने बताया है कि एक उत्तम निबंध में विचारों की मौलिकता, भाषा की शुद्धता और शैली की रोचकता होनी चाहिए। उसमें विषय का विस्तार अनावश्यक नहीं होना चाहिए और प्रत्येक अनुच्छेद एक-दूसरे से जुड़ा होना चाहिए। व्यक्तिगत रूप से, मैं निबंध लिखने से पहले उस विषय से संबंधित तथ्यों और उदाहरणों को एकत्रित करता हूँ। फिर मैं एक भूमिका (प्रस्तावना), मुख्य भाग और निष्कर्ष की संरचना तैयार करता हूँ। यह सुनिश्चित करता हूँ कि मेरे विचार स्पष्ट हों और पाठक को अंत तक कहानी की तरह बांधे रखें।
5. मानटेन ने “जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।” निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?
उत्तर: निबंध लेखन में प्रत्यक्ष अनुभव और अवलोकन की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि इससे रचना में सजीवता और प्रमाणिकता आती है। लेखक की अपनी अनुभूति पाठकों के हृदय को छूती है और निबंध को किताबी ज्ञान से ऊपर उठाती है।
विस्तृत व्याख्या: मानटेन की यह पद्धति निबंध को आत्मपरक और प्रभावशाली बनाती है। जब एक लेखक अपनी आँखों से देखी गई घटनाओं या मन से अनुभव किए गए भावों को लिखता है, तो उसमें एक अनूठा ‘उल्लास’ और ‘सच्चाई’ होती है। केवल सुनी-सुनाई बातों या दूसरों के उद्धरणों पर आधारित निबंध नीरस और शुष्क हो सकते हैं। अनुभव आधारित लेखन पाठकों को लेखक के व्यक्तित्व से जोड़ता है। इससे भाषा सहज हो जाती है और लेखक बिना किसी कृत्रिम बनावट के अपने विचारों को स्वच्छंदता से व्यक्त कर पाता है, जो कि एक अच्छे निबंध की आत्मा है।
भाव विस्तार – (पेज 37 के प्रश्न उत्तर)
1. “जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।”
भाव-विस्तार: इस पंक्ति का भाव यह है कि युवाओं को दुनिया बहुत खूबसूरत और आसान लगती है क्योंकि वे अभी व्यावहारिक जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों से दूर होते हैं। जब तक मनुष्य खुद जिम्मेदारी नहीं उठाता, तब तक उसे संसार में सब कुछ अच्छा और कल्पनाओं जैसा सुखद दिखाई देता है।
2. “मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।”
भाव-विस्तार: इस पंक्ति का भाव यह है कि संसार हमेशा बदलता रहता है और हर समय में समाज में कुछ न कुछ कमियाँ या बुराइयाँ आ ही जाती हैं। इसलिए, समाज को बेहतर बनाने और तरक्की की राह पर ले जाने के लिए हर युग में नए सुधारों की जरूरत हमेशा बनी रहती है।
3. “आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।”
भाव-विस्तार: इस पंक्ति का भाव यह है कि समय कभी रुकता नहीं और परिवर्तन जीवन का नियम है। आज जो युवा वर्तमान से नाराज होकर बदलाव चाहते हैं, बुढ़ापे में वे खुद भी पुराने विचारों के हो जाएँगे और अपने बीते हुए समय को ही सबसे अच्छा मानकर उसकी यादों में खोए रहेंगे।
4. “निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है।”
भाव-विस्तार: इस पंक्ति का भाव यह है कि लेखन में विस्तार से अधिक महत्व संक्षिप्तता और गहराई का होता है। एक छोटा निबंध अपनी बात को कम शब्दों में, स्पष्ट और प्रभावशाली ढंग से कह पाता है, जिससे पाठक बोर नहीं होते और वे उसे आसानी से समझ तथा याद रख पाते हैं।
मेरा अनुभव – (पेज 38 के प्रश्न उत्तर)
1. निबंध में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक आदि कई महान व्यक्तियों के नाम आए हैं। इनके विषय में जानकारी एकत्रित करके संक्षेप में बताइए कि इन्होंने अपने समय में समाज के लिए क्या-क्या कार्य किए।
उत्तर: निबंध में वर्णित बुद्ध, महावीर, कबीर और नानक जैसे महापुरुषों ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, जाति-पाति और भेदभाव को मिटाया। उन्होंने प्रेम, अहिंसा और समानता का मार्ग दिखाकर समाज को एक नई रोशनी दी।
विस्तृत व्याख्या: इन महापुरुषों ने अपने समय की कुरीतियों के विरुद्ध लड़कर समाज को नई दिशा दी।
बुद्धदेव और महावीर स्वामी (अहिंसा और दया): इन्होंने अहिंसा और जीव मात्र पर दया का संदेश दिया। इन्होंने ‘अहिंसा परमो धर्म:’ का संदेश देकर यज्ञों में होने वाली पशुबलि और ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया।
नागार्जुन और शंकराचार्य (ज्ञान और एकता): नागार्जुन ने विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में कार्य किया, जबकि शंकराचार्य ने ‘अद्वैतवाद’ के माध्यम से पूरे देश को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया। देश के चारों कोनों में पीठों की स्थापना करके पूरे भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया।
संत कबीर और गुरु नानक देव (धार्मिक आडंबरों पर प्रहार): मध्यकाल में संत कबीर और गुरु नानक देव ने धार्मिक आडंबरों और कट्टरता पर कड़ा प्रहार किया। कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया और जातिवाद को नकारा। गुरु नानक जी ने ‘लंगर’ जैसी परंपरा शुरू की, जहाँ राजा और रंक एक साथ बैठकर भोजन करते थे, जिससे सामाजिक समानता बढ़ी।
निष्कर्ष: इन महान विभूतियों के कार्यों के कारण ही आज हमारा समाज अधिक उदार और प्रगतिशील बन सका है।
2. निबंध में उल्लिखित महान व्यक्तियों ने अपने द्वारा किए गए कार्यों से समाज को एक नई दिशा दिखाई। हमारे आस-पास और भी ऐसे व्यक्ति और संस्थाएँ हैं जो स्त्री-शिक्षा, पर्यावरण, असमानता, विशेष आवश्यकता समूह (दिव्यांगजन) आदि के लिए कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं के विषय में पता लगाइए और लिखिए।
उत्तर: आज के समय में मलाल युसूफज़ई (स्त्री-शिक्षा) और चंडी प्रसाद भट्ट (पर्यावरण) जैसे लोग समाज के लिए समर्पित हैं। गूँज (Goonj) और हेल्पएज इंडिया जैसी संस्थाएँ समानता और दिव्यांगों के लिए सराहनीय कार्य कर रही हैं।
विस्तृत व्याख्या: स्त्री-शिक्षा (मलाला यूसुफजई): इन्होंने विपरीत परिस्थितियों में लड़कियों की शिक्षा के लिए वैश्विक आवाज उठाई। इनका ‘मलाला फंड’ आज भी दुनिया भर की वंचित बालिकाओं को मुफ्त और सुरक्षित शिक्षा दिलाने के लिए निरंतर काम कर रहा है।
पर्यावरण संरक्षण (चंडी प्रसाद भट्ट): भारत के प्रसिद्ध ‘चिपको आंदोलन’ के प्रणेता चंडी प्रसाद भट्ट ने जंगलों को बचाने के लिए ग्रामीणों को एकजुट किया।
समानता व मदद (‘गूँज’ संस्था): ‘गूँज’ संस्था शहरों के बेकार या पुराने सामानों को रीसायकल कर ग्रामीण इलाकों तक पहुँचाती है।
दिव्यांग व बुजुर्ग कल्याण (‘हेल्पएज इंडिया’): यह संस्था समाज के असहाय बुजुर्गों और विशेष आवश्यकता वाले दिव्यांगजनों की सेवा करती है। यह उन्हें मुफ्त चिकित्सा, आश्रय और व्हीलचेयर जैसी आवश्यक सुविधाएँ देकर गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करती है।
निष्कर्ष: समाज सुधार केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि एक जागरूक नागरिक के तौर पर हम भी छोटे-छोटे बदलावों से बड़ी क्रांति ला सकते हैं।
3. आपको ‘समाज-सुधार’ करने का अवसर मिले तो आप क्या-क्या सुधार करना चाहेंगे और कैसे करना चाहेंगे? लिखिए।
उत्तर: यदि मुझे समाज-सुधार का अवसर मिले, तो मैं गरीबों को मुफ्त शिक्षा और सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज दिलाऊँगा। इसके साथ ही युवाओं को डिजिटल हुनर सिखाकर आत्मनिर्भर बनाऊँगा तथा समाज से जातिवाद और भेदभाव पूरी तरह मिटाऊँगा।
विस्तृत व्याख्या: यदि मुझे समाज-सुधार का अवसर मिले, तो मैं निम्नलिखित सुधार करना चाहूँगा:
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा: हर गरीब बच्चे तक मुफ्त और अच्छी शिक्षा पहुँचाकर अज्ञानता को दूर करूँगा।
बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ: सरकारी अस्पतालों को आधुनिक बनाकर मुफ्त दवाइयाँ और योग्य डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करूँगा।
कौशल विकास: युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए डिजिटल शिक्षा और रोजगारपरक प्रशिक्षण केंद्र खोलूँगा।
पर्यावरण संरक्षण: कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के लिए काम करूँगा।
सामाजिक समानता: समाज से जातिवाद, लिंग-भेद और अंधविश्वास को मिटाने के लिए जागरूकता अभियान चलाऊँगा।
4. भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।
उत्तर: भारतीय साहित्य हमें सिखाता है कि जीवन तभी सफल है जब हमारे विचार शुद्ध (नैतिक), मन शांत (आध्यात्मिक) और कर्म सफल (व्यावहारिक) हों। इन तीनों का संतुलन ही सुखी जीवन का आधार है।
विस्तृत व्याख्या: भारतीय ज्ञान परंपरा में जीवन को एक यज्ञ माना गया है, जहाँ नैतिकता, आध्यात्मिकता और व्यवहारिकता के बीच संतुलन होना अनिवार्य है।
नैतिकता (Character Building): यह हमें सही और गलत के बीच का अंतर सिखाकर हमारे चरित्र का निर्माण करती है, जिससे हम सत्य के मार्ग पर चलते हुए दूसरों की मदद के लिए प्रेरित होते हैं।
आध्यात्मिकता (Mental Peace): नैतिक आचरण से मन में एक आंतरिक शक्ति या आध्यात्मिकता का जन्म होता है, जो हमें विपरीत परिस्थितियों में भी स्थिर रखती है और गहरी मानसिक शांति प्रदान करती है।
व्यवहारिकता (Duty Orientation): केवल विचारों की शुद्धता काफी नहीं है; मनुष्य को एकांत में बैठने के बजाय समाज में अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना चाहिए।
संतुलन का महत्व (Importance of Balance): जैसा कि गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है, हमें अपनी सही बुद्धि को आध्यात्मिक रूप से स्थिर रखकर व्यावहारिक जगत में पूरी कुशलता से कर्म करना चाहिए, क्योंकि वास्तविक सफलता केवल धन कमाने में नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों के साथ समाज के कल्याण में योगदान देने में है।
मेरा अनुभव (सृजन) – (पेज 38 के प्रश्न उत्तर)
1. ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ एक लोकोक्ति है। लोक में प्रचलित लोकप्रिय वाक्य या वाक्यांश को लोकोक्ति कहते हैं, जो किसी विशेष अर्थ या सीख को व्यक्त करता है। लोकोक्ति भाषा को समृद्ध करती है तथा विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सहायता करती है। यह लोगों के अनुभव, विश्वास और मूल्यों को दर्शाती है। आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी- ‘आम के आम गुठलियों के दाम’। अब आप इस लोकोक्ति और ‘जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास’ विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।
उत्तर: जैविक खाद बनाना ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ वाली बात है। इसमें हम रसोई के कचरे (गुठली) का उपयोग करके कीमती खाद (आम) प्राप्त करते हैं। इससे कचरा भी साफ होता है और मिट्टी को पोषण भी मिलता है।
विस्तृत व्याख्या: ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ लोकोक्ति का अर्थ है—दोहरा लाभ प्राप्त करना। जब हम ‘जैविक खाद निर्मिति’ की दिशा में प्रयास करते हैं, तो यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। सामान्यतः हम फलों के छिलके, सब्जियों के अवशेष और सूखी पत्तियों को बेकार समझकर फेंक देते हैं। लेकिन यदि हम इन ‘गुठलियों’ रूपी कचरे को एक गड्ढे में डालकर कंपोस्ट (जैविक खाद) तैयार करें, तो हमें बदले में शुद्ध और प्राकृतिक खाद प्राप्त होती है।
यह प्रक्रिया दोहरे लाभ की है। पहला लाभ यह कि हमारे घर और आसपास का वातावरण स्वच्छ रहता है और कचरे का सही प्रबंधन हो जाता है। दूसरा बड़ा लाभ यह है कि हमें बाजार से महंगी और रासायनिक खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। जैविक खाद से उगाई गई सब्जियां और फल स्वास्थ्य के लिए ‘आम’ की तरह मीठे और गुणकारी होते हैं। इस प्रकार, शून्य निवेश में उत्तम खाद प्राप्त करना पर्यावरण और जेब दोनों के लिए फायदेमंद है।
2. “जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं,तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।” आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो,पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।
उत्तर: एक बार मैंने दूर से एक विशाल पहाड़ी किले को बहुत डरावना और सुनसान समझा था। लेकिन जब मैं वहां पहुंचा, तो पाया कि वह स्थान अत्यंत सुंदर, शांत और ऐतिहासिक कहानियों से भरा हुआ था।
विस्तृत व्याख्या: प्रिय डायरी, आज मुझे ‘क्या लिखूँ?’ निबंध की वह बात याद आ गई कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’, लेकिन कभी-कभी इसका उल्टा भी होता है। पिछले साल जब मैंने शहर के सबसे बड़े पुस्तकालय की भव्य इमारत को दूर से देखा, तो मुझे लगा कि वहां का माहौल बहुत उबाऊ और सख्त होगा। मुझे डर था कि वहां केवल मोटी किताबों वाले गंभीर लोग होंगे और बहुत सन्नाटा होगा।
परंतु, जब मैं पिछले रविवार वहां गया, तो मेरा अनुभव बिल्कुल बदल गया। निकट से देखने पर पता चला कि वहां बच्चों के लिए एक बहुत ही सुंदर ‘एक्टिविटी कॉर्नर’ है। वहां की लाइब्रेरियन बहुत मिलनसार थीं और उन्होंने मुझे कहानियों की अद्भुत किताबें दिखाईं। जो जगह दूर से मुझे एक नीरस जेल जैसी लगती थी, वह पास जाने पर ज्ञान और मनोरंजन का स्वर्ग निकली। सचमुच, बिना पास गए और बिना अनुभव किए किसी भी चीज़ के बारे में राय बनाना सही नहीं है। अब मैं किसी भी स्थान को उसके बाहरी रूप से नहीं आंकता।
3. क्या लिखूँ का सारांश लिखिए । (गंगा अध्याय 2 पाठ्य पुस्तक 2026-27)
उत्तर: CBSE कक्षा 9 के लिए हिंदी गंगा (नया एनसीईआरटी 2026-27) दूसरा अध्याय पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (Padumlal Punnalal Bakshi) द्वारा रचित ‘क्या लिखूँ?’ एक विचारप्रधान रचना है, जिसमें लेखक ने निबंध लेखन की कला और उसकी कठिनाइयों का सुंदर वर्णन किया है। यह निबंध लेखक की उस मानसिक दुविधा को दर्शाता है, जब उन्हें दो अलग-अलग विषयों—’समाज-सुधार’ और ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर निबंध लिखने का कार्य सौंपा जाता है। लेखक बताते हैं कि एक आदर्श निबंध लिखना केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह विद्वानों के सिद्धांतों और लेखक की अपनी अनुभूतियों के बीच का सामंजस्य है। निबंध में ए.जी. गार्डिनर के इस मत की चर्चा है कि निबंध के लिए विषय नहीं, बल्कि लेखक की मानसिक स्थिति महत्वपूर्ण होती है।
लेखक ने इस निबंध के माध्यम से तरुणों और वृद्धों के मनोविज्ञान का भी सुंदर चित्रण किया है। वे बताते हैं कि तरुण भविष्य के सपने देखते हैं और बदलाव चाहते हैं, जबकि वृद्ध अतीत की स्मृतियों में सुख खोजते हैं। इसी कारण दोनों के लिए वर्तमान कष्टदायक होता है और वे सुधार की कामना करते हैं।
अंततः, लेखक यह समझाते हैं कि निबंध लेखन एक स्वच्छंद कला है, जहाँ लेखक अपने अनुभवों और विचारों को सहजता से लिपिबद्ध करता है।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा रचित ‘क्या लिखूँ?’ अध्याय के मुख्य बिंदु:
• लेखन की दुविधा: लेखक निबंध के विषय और उसकी रचना प्रक्रिया के बीच के द्वंद को बहुत बारीकी से प्रस्तुत करते हैं।
• विद्वानों के मत: निबंध में मानटेन और ए.जी. गार्डिनर जैसे विचारकों के सिद्धांतों का उदाहरण देकर निबंध की परिभाषा स्पष्ट की गई है।
• तरुण और वृद्ध का दृष्टिकोण: युवाओं की भविष्य की उज्ज्वल अभिलाषाओं और वृद्धों के सुखद अतीत के मोह की तुलना मनोवैज्ञानिक ढंग से की गई है।
• समाज-सुधार की निरंतरता: लेखक स्पष्ट करते हैं कि समाज-सुधार एक कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है, क्योंकि हर युग में नए दोष जन्म लेते हैं।
• अनुभव की प्रधानता: निबंध यह संदेश देता है कि सच्ची अनुभूति और निजी अनुभव ही किसी भी लेखन को प्रभावशाली और सजीव बनाते हैं।
चर्चा आधारित प्रश्न (Discussion Based Questions)
1. अमीर खुसरो आम लोगों के मन को बहलाने व हँसाने के उद्देश्य से ऐसे प्रयोग किया करते थे। आप उनके द्वारा रचित अन्य अनमेलियों, मुकरियों व पहेलियों का शिक्षक की सहायता से ढूँढ़कर संकलन कीजिए।
उत्तर: अमीर खुसरो की रचनाएँ लोक-मनोरंजन और बुद्धि-चातुर्य का अद्भुत उदाहरण हैं। उनकी एक प्रसिद्ध मुकरी है— “रात समय वह मेरे आवे, भोर भये वह घर उठि जावे। यह अचरज है सबसे न्यारा, ऐ सखि साजन? ना सखि तारा।” इसी प्रकार उनकी एक प्रसिद्ध पहेली है— “एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा। चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।” इसका उत्तर ‘आकाश’ है। उनकी ये अनमेलियाँ और पहेलियाँ भाषा को सरस तथा कौतुकपूर्ण बनाती हैं।
2. कक्षा में ‘युवा और वृद्ध- दो पीढ़ियों के पीढ़ीगत अंतर’ पर वाद-विवाद का आयोजन कीजिए।
उत्तर: इस वाद-विवाद में दोनों पीढ़ियों के दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट होता है।
युवा पीढ़ी के पक्ष में तर्क (In favour of Youth):
तकनीकी कुशलता: युवा पीढ़ी आधुनिक तकनीक और डिजिटल साधनों को बहुत तेजी से सीखकर उनका स्मार्ट उपयोग करती है।
प्रगतिशील सोच: युवा पुरानी रूढ़ियों को छोड़कर समाज में नए विचारों, समानता और मानसिक स्वास्थ्य का स्वागत करते हैं।
बदलाव की चाह: युवा वर्तमान व्यवस्था की कमियों को चुपचाप सहने के बजाय उनमें सक्रियता से तुरंत सुधार चाहते हैं।
वृद्ध पीढ़ी के पक्ष में तर्क (In favour of Elders):
अनुभव की पूँजी: वृद्ध पीढ़ी के पास जीवन के उतार-चढ़ाव का लंबा अनुभव होता है, जो हर संकट में सही राह दिखाता है।
धैर्य और संयम: बुजुर्ग विपरीत और कठिन परिस्थितियों में भी जल्दबाजी करने के बजाय हमेशा शांत रहकर सोच-समझकर फैसले लेते हैं।
संस्कारों के संरक्षक: वृद्ध पीढ़ी हमारे समाज के नैतिक मूल्यों, पारिवारिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखती है।
रिश्तों के प्रति समर्पण: बुजुर्ग हमेशा स्वार्थ से ऊपर उठकर परिवार को एक डोर में बांधने और मिल-जुलकर रहने की सीख देते हैं।
निष्कर्ष यह है कि युवाओं को वृद्धों के अनुभव और वृद्धों को युवाओं के नए विचारों का सम्मान करना चाहिए, तभी समाज का संतुलित विकास संभव है।
कल्पना आधारित प्रश्न (Imagination-Based Questions)
1. मान लीजिए आप अपने विद्यालय की ‘बाल संसद’ के प्रधानमंत्री चुने गए हैं। आप अपने क्षेत्र या विद्यालय में ‘समाज-सुधार’ के लिए कौन-से दो मुख्य कार्य करना चाहेंगे और उन्हें कैसे लागू करेंगे? कल्पना करके लिखिए।
उत्तर: यदि मैं बाल संसद का प्रधानमंत्री चुना जाऊँ, तो मेरा पहला सुधार कार्य विद्यालय में ‘पूर्ण स्वच्छता और कचरा प्रबंधन’ होगा। इसे लागू करने के लिए मैं हर कक्षा के विद्यार्थियों की एक निगरानी टीम बनाऊँगा, जो रीसाइकिलिंग पर ध्यान देगी। दूसरा कार्य ‘समानता और सहपाठियों की मदद’ होगा। इसके अंतर्गत मैं एक ‘बुक-बैंक’ स्थापित करूँगा, जहाँ अमीर छात्र अपनी पुरानी किताबें जमा करेंगे ताकि जरूरतमंद छात्रों को मुफ्त में पढ़ाई की सामग्री मिल सके। इन कार्यों से सहयोग और जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी।
2. कल्पना कीजिए कि आप किसी ऐसे स्थान की यात्रा पर गए हैं जिसे आपने दूर से बहुत सुंदर समझा था, लेकिन पास जाने पर आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा। इस खट्टे-मीठे अनुभव को एक डायरी के पन्ने के रूप में लिखिए।
उत्तर: प्रिय डायरी, आज मुझे बख्शी जी की बात याद आई कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’। मैंने इंटरनेट पर पहाड़ों के बीच स्थित एक प्रसिद्ध झील की तस्वीरें देखी थीं, जो जादुई लग रही थीं। मैं बड़ी उम्मीदों से वहाँ पहुँचा, लेकिन पास जाने पर मेरा अनुभव बिल्कुल अलग रहा। झील के चारों ओर पर्यटकों द्वारा फैलाया गया प्लास्टिक का कचरा और गंदगी देखकर मेरा मन उदास हो गया। दूर से शांत दिखने वाली वह जगह पास से बहुत शोरगुल वाली थी। इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि बाहरी चमक हमेशा सच नहीं होती।
क्या लिखूं? – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: क्या लिखूं किसकी रचना है?
उत्तर: ‘क्या लिखूँ’ हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार और आलोचक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की एक उत्कृष्ट गद्य रचना है। यह उनके गहरे चिंतन और गंभीर विषयों को भी अत्यंत सरल शैली में प्रस्तुत करने की कला को दर्शाती है।
प्रश्न 2: दूर के ढोल सुहावने होते हैं किसकी रचना है?
उत्तर: यह कोई स्वतंत्र रचना नहीं, बल्कि पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा रचित प्रसिद्ध निबंध ‘क्या लिखूँ’ का ही एक मुख्य अंश (शीर्षक) है, जिसमें उन्होंने मानव स्वभाव की इस हकीकत को खूबसूरती से दर्शाया है।
प्रश्न 3: बक्शी जी का पूरा नाम क्या था?
उत्तर: बख्शी जी का पूरा नाम ‘पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी’ था। इनका जन्म छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ में हुआ था और वे हिंदी के प्रसिद्ध छायावादोत्तर युग के प्रमुख निबंधकार, समालोचक तथा ‘सरस्वती’ पत्रिका के कुशल संपादक थे।
प्रश्न 4: क्या लिखूं किस विधा की रचना है?
उत्तर: ‘क्या लिखूँ’ साहित्य की ‘निबंध’ विधा की रचना है। यह एक विचारात्मक और ललित निबंध है, जिसमें लेखक ने वर्तमान की समस्याओं, युवा और वृद्ध पीढ़ी के मनोविज्ञान तथा लेखन कला का बहुत सुंदर विश्लेषण किया है।
